अक्सर पढ़ता हूँ...मोदी कोई सख्त कदम उठाने से बच रहे हैं क्योंकि उनके किसी कदम से देश गृह युद्ध की ओर चला जायेगा, जिसके लिए हिन्दू अभी तैयार नहीं है...
इस बात में तथ्य तो है, पर इससे पूर्णतः सहमत नहीं हो पा रहा हूँ, क्योंकि इसके लॉजिक में कुछ समस्या है.
याद करें, 2014 में मोदी की सरकार आने से पहले मुल्लों की फटी पड़ी थी कि मोदिया आ गया तो बाँस कर देगा... पूरे देश में गोधरा कर देगा...
फिर धीरे धीरे छिटपुट घटनाएँ हुईं...इक्का दुक्का हिन्दू कार्यकर्ताओं की हत्या हुई...फिर मालदा जैसे शक्ति प्रदर्शन हुए...एक एक करके मोदी की इच्छा शक्ति को मापा गया. फिर उन्हें समझ में आने लगा कि मोदी उनसे डरते हैं, इसी गृह युद्ध से आशंकित हैं...उन्हें मोदी खेत का रखवाला नहीं, खेत में खड़ा कौवे उड़ाने वाला पुतला लगने लगा...सारे कौवे एक एक करके उसके सर पर बैठ कर हगने लगे...जब पुतला फिर भी नहीं हिला तो फिर खेत चुगने लगे...
आप हमें बताते रहे कि यह पुतला नहीं है...यह सचमुच में उन्हीं चिड़ियों को पकड़ने वाला बहेलिया है...और उसने खेत में जाल लगा रखा है...देखो कैसे एक साथ सबको पकड़ता है...वह सिर्फ उनको धोखा देने के लिए सबको अपने सर पर हगने दे रहा है...
देखिए, गृह युद्ध तो होगा...और तैयारी करने के लिए समय हिन्दू को चाहिए...उनकी तैयारी तो पूरी है...उन्हें रोके हुए क्या है? उनका गणित था कि देश में सरकार अपनी होगी, सरकारी मशीनरी अपनी होगी...और बाकायदा कानूनी छत्रछाया में यह काम करेंगे...अगर आपको साम्प्रदायिक हिंसा विधेयक की छाया याद है तो आप समझेंगे कि यह तैयारी क्या थी...कि हिंदुओं से प्रतिकार का कानूनी हक छीन लिया जाए...
2014 में सरकार बनने से, मोदी के आने से उनका गणित गड़बड़ा गया. अब उन्हें सरकारी मशीनरी के बिना, या सरकारी मशीनरी के विरुद्ध जाकर लड़ाई करनी थी. सरकारी मशीनरी के विरुद्ध जाकर लड़ने की हिम्मत नहीं थी, सरकारी मशीनरी के बिना हिंदुओं पर वो भारी पड़ेंगे, यह उनका आकलन कहता है. आपको ओवैसी की "पंद्रह मिनट के लिए पुलिस हटा लो" वाली ललकार याद हो तो आप इस बात को समझेंगे...
गृहयुद्ध की परिभाषा समझें...अगर देश में मुसलमान सरकारी तंत्र के विरुद्ध खड़ा होता है और शासन की शक्ति के प्रयोग से उसका दमन किया जाता है तो इसे गृह युद्ध नहीं, विद्रोह कहेंगे. अगर शासन तंत्र मूक बना रहता है, जैसा आज बना हुआ है और हम आप आत्मरक्षा में खड़े होते हैं, तो इसे गृहयुद्ध कहेंगे..
मोदी की ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं होने से उन्होंने इसका अर्थ यही निकाला है, कि पुलिस हटा ली गई है. आज अगर मुसलमान हिन्दू पर आक्रामक होता है, तो सरकारी तंत्र बीच में नहीं आएगा. इस दृष्टि से देखें तो उनके लिए गृहयुद्ध शुरू करने का अनुकूल समय आ गया है...यानि गृह युद्ध की ओर देश को मोदी का कोई कदम नहीं ले जाएगा, बल्कि मोदी की हिचकिचाहट, डर या कड़े शब्दों में कहें तो अकर्मण्यता ही गृहयुद्ध का आमंत्रण है...
दूसरी तरफ इस बात से भी इंकार नहीं है कि हिन्दू समाज ऐसे संघर्ष के लिए तैयार नहीं है...इसे तैयार होना होगा...
तो आपको क्या लगता है, हिन्दू समाज को ऐसी तैयारी के लिए कितना समय चाहिए? 2-3 सालों में यह हो जाएगा क्या? कान्वेंट स्कूलों में पढ़ी हुई, MNC में नौकरी का सपना पालने वाली पीढ़ी इस युद्ध के लिए रातोंरात तैयार हो जाएगी? उसे तो यह समझना भी बाकी है कि यह उसके अस्तित्व का युद्ध है. जिसने कभी स्विमिंग पूल का मुँह भी नहीं देखा हो, उसे पूल के गहरे हिस्से में नहीं, उफनती गँगा में फेंक कर तैरने की उम्मीद करना समझदारी है क्या? और इस पीढ़ी को इसके लिए तैयार करने की जिम्मेदारी किसकी है? और इसके क्या प्रयास हुए हैं? शिक्षा में कौन सा मूलभूत परिवर्तन करने का प्रयास हुआ है? नोटबन्दी में और जीएसटी लागू करने में जो विलक्षण इच्छाशक्ति दिखाई गई है, वह मीडिया को कंट्रोल करने में और देशद्रोहियों को कुचलने में क्यों नहीं दिखाई देती? जन की मानसिकता को प्रभावित करने के तंत्र आपने जब शत्रुओं के हाथ में छोड़ रखे हैं तो कैसे उम्मीद करते हैं कि अपने आप हिन्दू आत्मरक्षा के लिए तत्पर हो जाएगा? और अगर नहीं तैयार हो पाया और आपकी अक्षमता ने हिंदुओं को असमय इस युद्ध में धकेल दिया तो आप सिर्फ लोगों को दोष देकर इतिहास में मुँह छुपा लेंगे क्या?
इतिहास की प्रकृति को समझें...वहाँ ऐसे बहानों की जगह नहीं है. अगर हम इतनी सदियों के सतत आक्रमण के बावजूद जिन्दा हैं तो संयोग से नहीं हैं...लड़ कर जिंदा हैं...पर पिछले 100 सालों में यह प्रशिक्षण खो गया है. युद्ध के लिए दरातियाँ पिघला कर तलवारें बनाने का फिल्मी डायलाग बढ़िया है...पर उन तलवारों को चलाने का प्रशिक्षण होना चाहिए...सिर्फ सेंटीमेंट्स से युद्ध नहीं जीते जाते. प्रशिक्षित सेनाएं ही युद्ध जीतती हैं. जो युद्ध शुरू होने पर दरातियाँ पिघलाने के लिए लोहार के यहाँ जाते हैं, वे युद्ध खत्म होने तक उसे पकड़ना भी नहीं सीख पाते...
मोदी जी से नेतृत्व की अपेक्षा है...वह तीन स्तरों पर है... शासन तंत्र का प्रयोग करके विद्रोह को कुचलना और शत्रु का मनोबल गिराए रखना...देश के मानस को प्रशिक्षित करके देश को आसन्न गृहयुद्ध के लिए तैयार करना...और फिर अपने समय से अपनी शर्तों पर युद्ध घोषित करके उसमें विजय तक नेतृत्व करना....तभी आप राष्ट्र-निर्माता कहलायेंगे...18 घंटे फाइलें निबटा कर नहीं...
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