ट्रॉय के हिन्दू ।
ट्रॉय के पतन पर कई बार लिख चुके अलग अलग एंगल से फिर भी यह विषय पुराना नहीं होता, सदैव प्रासंगिक रहता है।
ग्यारह वर्ष लड़े थे। लेकिन एक रात में कट गया शहर। क्यों ?
क्योंकि उन्हें केवल शत्रु से मुक्ति चाहिए थी। शत्रु को नष्ट करना नहीं था। ऊब चुके थे लड़ाई से।
आप कहेंगे, ये तो स्वाभाविक है। इतने लंबे तो विश्वयुद्ध भी नहीं चले। इतना कौन लड़ता है। जिस हेलन को लेकर लड़ाई शुरू हुई थी, इतने लंबे चलते युद्ध से उसका रूप भी अपना निखार खो चुका होगा। लेकिन ज़रा ट्रॉय के शत्रुओं की भी बात करें ?
ग्रीक, जो ट्रॉय से लड़ने आए थे - ऊब तो उनके सैनिक भी गए थे। ग्यारह साल अपने घरों से दूर थे। ट्रॉय वाले तो कम से कम रात को घर लौटते थे, घर का खाना खाते थे, अपने घर में सोते थे। बाकी ज़िंदगी चल रही थी। सूर्य देवता के आशीर्वाद से नगरी का तट अभेद्य था, शत्रु से टूट नहीं सकता था। ग्रीक रोज बस अपने लोगों को लड़ते मरते देख रहे थे।
युद्ध से हल नहीं निकला तो ग्रीकों ने छल का सहारा लिया। लकड़ी का महाकाय घोडा बनाया जिसके अंदर चुपचाप सैनिक बिठाये। जासूसी जानकारी द्वारा पता किया कि बहुत नज़दीक किसी जगह पर छुप सकते हैं जो ट्रॉय वालों की नज़र से ओझल था। वहाँ जा छुपे और तमाशा यह खड़ा किया कि युद्ध हम जीत नहीं सकते, ट्रॉय को अथेना देवी का आशीर्वाद है वो हमारा नुकसान करा रही है और ट्रॉय को हारने नहीं दे रही। इसलिए यह घोडा अथेना को भेंट छोड़कर जा रहे हैं। बहुत हुआ।
अपने ही एक आदमी को कुछ मामूली घाव दे कर वहाँ छोड़ा । उसने सुबह सुबह खाली किनारा देख चकित ट्रॉय वालों को यह कहानी 'बेची'। सफल हुआ क्योंकि उसको कुछ यातनाएँ दी गयी थी फिर भी उसने कहानी नहीं बदली, एक ही बात पर टिका रहा ।
ट्रॉय के नागरिक उस महाकाय लकड़ी के घोड़े को नगर के अंदर लाये। ग्रीकों ने उसकी ऊंचाई जान बूझकर उतनी रखी थी कि महाद्वार के ऊपर के तट की दीवार तोड़नी ही पड़े। सयानों के लाख कहने के बावजूद ट्रॉय वालों ने दीवार तोड़ी। कसान्द्रा, लाओकून की चेतावनियों के बावजूद उनकी किसी ने नहीं सुनी। यहाँ दीवार तोड़ने से सूर्य देवता कुपित हुए। अब नगर का विनाश अवश्यभावी था ।
लोगों ने घोडा नगर के मध्य चौक में लाया और खूब रंगरेलियाँ मनाई। दारू, स्त्री पुरुषों का सह नृत्य। फिर सारे घर जा कर सो गए। आधी रात को घोड़े से ग्रीक उतरे, ऊँघते प्रहरीयों को काट दिया और तट पर चढ़कर मशाल से अपनी जहाजों को इशारा किया। तुरंत पूरा बेड़ा चला आया, सेना ट्रॉय में घुसी और रातोरात ट्रॉय का बेड़ा गर्क कर दिया। ग्यारह साल की अथक लड़ाई लड़नेवाले शहर को एक रात की लापरवाही ने मिट्टी में मिला दिया।
कहानी सत्य हो या न हो, इसमें सबक अवश्य है।
ट्रॉय वालों ने ग्रीस पर आक्रमण नहीं किया था। हाँ, हेलन को न लाते या लाते ही उसे उसके पति को लौटाते तो युद्ध नहीं करना पड़ता। यूं भी राजकुमार पैरिस एक ब्याहता को फुसलाकर लाया था जो अपने आप में अनैतिक भी था।
लेकिन जब युद्ध ठन ही गया तो युद्ध के हिसाब से चलना चाहिए और सब से आवश्यक है शत्रु को समझना। यह सब से बड़ी भूल होती है अगर आप उसे आप के जैसा ही समझते हैं। आप के नीति नियमों का अनुसरण करनेवाला समझते हैं। फिर ट्रॉय जैसी दुर्गति निश्चित है।
यहाँ कहीं आप को लग रहा है कि मैं इतना समय ट्रॉय की ही नहीं बल्कि हिंदुओं की भी बात कर रहा था, तो आप का अनुमान पूर्ण सत्य है।
मंदिर को लेकर लोगों का आक्रोश देखकर यही सोचता हूँ कि मैं अगर विधर्मियों का बड़ा नेता होता और मेरी बात सभी विधर्मी मानते तो मैं राम मंदिर के राह में कोई रोड़ा नहीं डालता, बल्कि खुद उसके बनाने में बढ़चढ़कर सहकार्य करता। जय श्री राम का नारा तो नहीं लगाता लेकिन जय श्री राम लिखी हुई ईंटें सप्लाई का ठेका लेता, काफिर से कमाता। राजमेस्त्री, बढ़ई, प्लमबर, इलेक्ट्रिशियन, सभी काम उम्मतियों को ही दिलवाता। तिलक नहीं लगवाता, आरती नहीं करता लेकिन सभी समारोहों में साथ में फोटो जरूर खींचवाता।
क्योंकि मुझे पता है कि ट्रॉय का नागरिक हिन्दू, इस 'जीत' के बाद सो जाएगा। बिलकुल वैसे ही बेखबर, जैसे ट्रॉय के नागरिक सोये थे।
ग्रीकों को जीत महत्व की थी। नकली हार दिखाने से उन्हें कोई परहेज नहीं था। हम छब्बीस साल की लड़ाई खत्म देखने चाहते हैं, बस । हम ये समझना चाहते ही नहीं कि हमारे शत्रु हज़ार साल से हमें ही खत्म देखना चाहते हैं।
असली लड़ाइयाँ तीन मिनटों की विडियो क्लिप्स नहीं होती। चैनल बदलने का ऑप्शन भी नहीं होता। युद्ध क्या है और क्यों है यह समझे तो पता चलेगा कि आगे क्या करना है। कम से कम सोच जागेगी कि आगे के लिए कुछ करना है जो मोदी के जीवनकाल (केवल कार्यकाल नहीं) के बाद भी आप की तीसरी पीढ़ी के काम आये, वे हिन्दू रहकर गर्व से जी सकें।
मोदी जी के बाद की सोचें। आवश्यक है। जब वे नहीं रहेंगे तब भी आप रहेंगे । अन्यथा उनके जाते ही राम नाम सत्य हो जाएगा । उनको गालियां दे कर परिस्थिति नहीं सुधरेगी |
बड़ा ही आसान है ये कहना कि, कुछ बात है हममे की हस्ती मिटती नहीं हमारी बिलकुल सही बात पर मेरे भाई आँख खोलकर के ये भी तो देखो कभी अफगानिस्तान तक थी बस्ती हमारी |
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