यह युद्ध है। यह भारत मे फैल चुके इस्लामिक आतंकवाद की, संकल्पित बलात्कारीकरण की सैन्य रणनीति है।

बच्चियों के साथ बलात्कार व हत्या: यौन विछिप्तता नही, युद्ध है
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सृष्टि की उत्पत्ति के बाद जब सभ्यताएं बनी और उससे कबिले, राज्य और साम्राज्य बने तब से ही मनुष्य नामक प्रजाति, की दूसरे पर विजय पाने की अदम्य प्रकृति रही है। मनुष्य की इस प्रकृति का सबसे दुर्दांत पक्ष यही रहा है कि यह युद्ध पुरुष लड़ता रहा है और अपनी तमाम कुंठाये और विकृतियां का तर्पण, महिलाओं पर, बलात्कार और फिर उनकी हत्या करके करता रहा है।

प्रारम्भ में, इसके अभिलेख न के बराबर रहे है। लेकिन जब से मनुष्य इस त्रासदी को लिपिबद्ध करने लगा है, तब से लोग, युद्धकाल मे शत्रु पक्ष की बालिकाओं और स्त्रियों से बलात्कार को युद्ध की अपरिहार्यता मानते हुये, इस पर गम्भीर चर्चा करने से बचते रहे है। मानव स्मृति ने इन युद्धकालीन बलात्कारों से हमेशा आंख चुराई है। ये बलात्कार 19वी शताब्दी तक तो, कुछ अपवादों को छोड़ कर, युद्ध के संस्मरणों व इतिहासकारों के आंकड़ों तक ही सीमित रहे लेकिन 20वी शताब्दी में द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान, आक्रमणकारी सेना द्वारा, शत्रु राष्ट्र की स्त्रियों से बलात्कार करने को, युद्ध मे एक अस्त्र के रूप में उपयोग किया गया। इतना ही नही, इस बलात्कार को सामरिक महत्व के रूप में स्वीकार भी गया था। आज 21वी शताब्दी है, जिसमे इस बलात्कार को, युद्ध की एक संकल्पित सैन्य रणनीति ही बना दिया गया है।

द्वितीय विश्वयुद्ध में मोरक्को की सेना ने, इटली के विरुद्ध स्वतंत्रता के लिए लड़ रहे फ्रांसीसियों का साथ इस शर्त पर दिया था की उनको शत्रु प्रदेश(इटली) में बलात्कार और लूट करने की पूरी स्वतंत्रता होगी। वैसे तो जर्मन, यहूदियों को निम्न नस्ल का मानते थे लेकिन यहूदियों के आत्मसम्मान को तोड़ने का बहाना करते हुए उनके स्त्री वर्ग के साथ बलात्कर करना अपना नर्सेगिक अधिकार समझते थे।

यदि अपनी यादाश्त की बात करूं तो पश्चिमी पाकिस्तान की सेना ने, अपना अधिकार सुनश्चित बनाये रखने के लिए, अपने ही पूर्वी पाकिस्तान की बंगाली स्त्रियों के साथ, 1971 में सामूहिक बलात्कार किया था। यही सब 1974 मे तब भी हुआ जब तुर्की ने 1974 में साइप्रस पर कब्ज़ा करने के लिए आक्रमण किया था।

सीमा के अंदर घुस आयी सेना द्वारा, शत्रु पक्ष की स्त्री जाति का बलात्कार करने के पीछे उद्देश्य, केवल उसकी यौनक्षुधा को तृप्त करना नही होता बल्कि इस बलात्कार और यौनउत्पीडन से, पूरे वातावरण को प्रभावित करना होता है। उनका उद्देश्य, पीड़िता के माध्यम से उसके परिवार और समुदाय को आर्थिक, शारीरिक, मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक रूप से विध्वंस करना होना होता है।

यह युद्ध भारत मे भी चल रहा है। फर्क सिर्फ इतना है कि यह युद्ध राष्ट्रों के बीच न होकर, धर्म का हो गया है। भारत मे कुछ समय पहले से विधर्मियों द्वारा हिंदुओं के साथ बलात्कार की घटनाएं संज्ञान में आती रही है लेकिन उसे विधर्मियों द्वारा किसी दीर्घकालीन योजना के तहत न मान कर, स्त्रियों के विरुद्ध अपराध के रूप में ही देखा जाता रहा है।

लेकिन यह सब पुलवामा आतंकवादी घटना के जवाब में पाकिस्तान के अंदर घुस कर बालाकोट में हुए हवाई आक्रमण ने बदल दिया है। भारतीय सेना द्वारा किये गए इस सफल दुस्साहसिक हमले से खिसियाये, हताश व अपनी असफलता से लज्जित पाकिस्तान व उसकी जिहादी जनता ने अपना सारा आक्रोश, पाकिस्तान में बची खुची हिन्दू जनता से लिया है। बालाकोट की घटना के बाद, पाकिस्तान में हिन्दू लड़कियों को जबरदस्ती उठा लेजाने और उनका जबरदस्ती धर्मांतरण कर के निकाह कराए जाने की बाढ़ आगयी है। यदि पाकिस्तान की मीडिया को गौर से अनुसरण करें तो कोई सप्ताह ऐसा नही बिताता जिसमे वहां की हिन्दू लड़कियों का बलात्कार कर के या तो गायब कर दिया जाता है या फेंक दिया जाता है।

मैं समझता हूँ कि भारत के वे मुस्लिम, जो पाकिस्तान के इस्लाम में अपनी जेहादी आशा देखते है और वहां के मुस्लिमो का अनुसरण करते है, वे अपने पिशाचत्व को उन्हीं से सींच रहे है। यह जो 23 मई 2019 को फिर से नरेंद्र मोदी जी की सरकार आयी है, वह भारत के मुस्लिमो के एक बड़े वर्ग के लिए, हिन्दुओ की सरकार है, वह उनकी सरकार नही है। मोदी सरकार को दोबारा आने से रोकने के लिए मुस्लिमो ने अपने नेतृत्व का खुल कर साथ दिया और एड़ी से चोटी तक का जोर भी लगाया, लेकिन राष्ट्रवादि बौछार के आगे हार गए। यह उनके लिए उनकी संगठित हिन्दुओ के आगे, पराजय थी। इस पराजय की अग्नि में जलते हुए लोगो ने वही किया है जो लज्जित, हताश व अपमानित सेना करती है। उन्होंने अपनी सारी वितृष्णा और पिशाचत्व का शिकार, हिन्दुओ के सबसे कमजोर और मासूम को बनाया है।

यहां सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इन बलात्कारियों के समाज की स्त्रियां, सब जानते हुए, उससे तटस्थ रहती है या फिर बलात्कार को दार्शनिकता और धार्मिक कर्मकांड के माध्यम से, उसे समाज मे स्वीकार्य कराती है। यह बात कैरो, मिस्र की अल-अज़हर की इस्लामिक प्रोफेसर सऊद सालेह, जो स्त्री है, की बात से समझी जा सकती है। उन्होंने युद्ध मे मुस्लिमों द्वारा शत्रुओं के साथ किये गए बलात्कार को इस्लामिक बताया है। युद्ध मे एक मुस्लिम द्वारा, काफिर का दर्पमर्दन करने लिए बलात्कार करना इस्लामिक बताया है। ।

मैं नही समझता कि यह अलीगढ़, बाराबंकी, मेरठ, बरेली, हमीरपुर, अमरोहा और अब बनारस में जो होता हुआ दिख रहा है यह कोई यौन वितृष्णा की घटना है। यह सीधे सीधे हिन्दू मानसिकता और मनोबल को छिन्न भिन्न करने का सुनियोजित षणयंत्र है।

यह युद्ध है।

यह भारत मे फैल चुके इस्लामिक आतंकवाद की, संकल्पित बलात्कारीकरण की सैन्य रणनीति है।

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