कांग्रेस के लिए यह असहनीय है कि देश के इतिहास में नेहरू-गाँधी परिवार के अलावा किसी और का नाम आदर के साथ लिया जाये इसीलिए सावरकर ही नहीं , कांग्रेस ने सभी सेनानियों की महत्ता को कम करने कि कोशिश की है, फिर चाहे लोकमान्य हो , गोखले हो या सुभाष चंद्र।

राष्ट्रभक्तो और इतिहास पुरुषो के योगदान पर अपनी राजनैतिक सोच के चलते कालिख पोतना एक अक्षम्य अपराध है, मगर दुर्भायवश भारत में यह बार बार हुआ है ।

कांग्रेस के लिए यह असहनीय है कि देश के इतिहास में नेहरू-गाँधी परिवार के अलावा किसी और का नाम आदर के साथ लिया जाये इसीलिए सावरकर ही नहीं , कांग्रेस ने सभी सेनानियों की महत्ता को कम करने कि कोशिश की है, फिर चाहे लोकमान्य हो , गोखले हो या सुभाष चंद्र।

इसीलिए जब बात स्वंत्रता संग्राम सेनानियों की आती है तो कॉंग्रेसियो का ज्ञान सिर्फ दो-तीन लोगो तक ही सीमित रहता है। आम कांग्रेसी की बात तो छोड़िये , गारंटी से कह सकता हू की राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा को भी यह नहीं मालूम होगा कि लाल-बाल-पाल कौन थे और उनके पूरे नाम क्या थे? अशफ़ाकउल्ला को किस प्रकरण में फांसी हुई और बिस्मिल का पूरा नाम क्या था? कभी मौका लगे तो कांग्रेस के इन तीसमारखाओ से पूछियेगा कि बलवंत फड़के, चाफेकर बंधू ,रानाडे , खुदीराम बोस , उधमसिंघ और मदनलाल ढींगरा कौन थे? कूका विद्रोह क्या था?

वैसे यह आश्चर्य की बात है कांग्रेस को धर्म के आधार पर देश का विघटन कराने वाले जिन्ना से कोई परहेज नहीं है और देश का विभाजन स्वीकार करने वाले नेहरूजी इनके लिए पूज्य है, तब यह समझ में नहीं आता है कि अखंड भारत की बात करने वाले सावरकर , इन लोगो क्यों अस्वीकार्य है??

आज़ादी के बाद कांग्रेस के समर्थित इतिहासकारो और बुद्धिजीवी वर्ग ने इस देश में भाट-चारण संस्कृति को एक बार फिर से जीवित किया और नेहरू को उदार दिखाने के लिए हिन्दू संस्कृति की बात करने वाले सारे नेताओ के व्यक्तित्व को एक नेगेटिव करैक्टर के रूप में प्रस्तुत किया गया। फिर चाहे तिलक हो, लाला लाजपत राय हो ,महामना मालवीय हो , गोखले हो या फिर सावरकर। बाद में इस भाटचारण वर्ग ने गाँधी-नेहरू परिवार की महिमा के गुणगान को ही अपना उद्देश्य बना लिया और ऐतिहासिक तथ्यों को अपने हिसाब से प्रसारित कर इंदिरा को इंडिया और इंडिया को इंदिरा का पर्याय बना डाला। इस भाट चारण ब्रिगेड का बस चलता तो वे अभी तक राहुल बाबा को महान क्रांतिकारी बता कर उनके पूर्व जन्म कि जातक कथाएँ भी आपको सुना डालते और प्रियंका को रानी लक्ष्मी बाई का अवतार बता चुके होते।

कॉंग्रेसियो ने इतिहास के उन पन्नो को समय की गर्त में दबा दिया जिनमे नेहरू -गाँधी में अलावा किसी अन्य क्रांतिकारियों का जिक्र था। आज़ादी के बाद इतिहास कुछ इस तरह से आगे बढ़ाया गया, जिसमे गाँधी और नेहरू के अलावा सब नेता गौण कर दिए गये। निश्चित योजना के तहत सभी महान हस्तियों की गरिमा को कम करने का प्रयास किये गये , लोकमान्य तिलक को महाराष्ट्र तक सीमित कर दिया गया और गोखले को सालाना कार्यक्रम तक। सुभाष चंद्र बोस का भी यही हाल हुआ , वे बंगाल तक सीमित कर दिए गये। चन्द्रशेखर आज़ाद और भगत सिंह को उग्रवादी बता कर उनके योगदान को नकारने की कोशिश की गई।

कांग्रेस आपको आज़ादी आंदोलन में इंदिरा जी के थोड़े से योगदान का भी बढ़ा चढ़ा कर जिक्र तो करती नज़र आएगी मगर महान क्रांतिकारी रासबिहारी बोस , मास्टर सूर्यसेन , श्याम जी कृष्ण वर्मा , दुर्गा भाभी ,बिरसा मुंडा , टांटिया भील या संथाल विद्रोह का कोई जिक्र नहीं करती !!

इस एकतरफा इतिहास का ही परिणाम है कि नई पीढ़ी को ज्यादातर क्रांतिकारियों के बारे में कोई जानकारी नहीं है और जो क्रांतिकारी जनमानस में अपनी पैंठ बना चुके थे, उनके प्रति लोगो के मन में सम्मान को किस तरह ख़त्म किया जा सके, यह दुष्प्रचार उसी रणनीति का हिस्सा है।

अब बात सावरकर की,

"मातृभूमि! तेरे चरणों में पहले ही मैं अपना मन अर्पित कर चुका हूँ। देश-सेवा ही ईश्वर-सेवा है, यह मानकर मैंने तेरी सेवा के माध्यम से भगवान की सेवा की।"

स्वातंत्रवीर होने के साथ साथ वे कलम और क्रांति के शलाखा पुरुष भी थे। सावरकर एक बहुआयामी व्यक्तित्व का नाम था, वे न सिर्फ एक महान क्रांतिकारी और प्रखर राष्ट्रवादी नेता थे , एक इतिहासकार, समाज सुधारक, विचारक, चिंतक, साहित्यकार भी थे। उनकी पुस्तकें क्रांतिकारियों का होंसला बढ़ाती थी। उनको पढ़कर बहुत सी बातें यह प्रमाणित करती हैं कि उस दौर में ‘उनसे’ बेहतर विचारक नहीं था।

समाजसुधारक और चिंतक

वे महान समाज सुधारक थे। जाति -धर्म के बंधनो का जिस तरह विरोध उन्होंने किया है , विरले ही समाज सुधारको ने किया है। इस मामले में वे गाँधी के बहुत पहले पुरजोर रूप से इन सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर चुके थे।

अस्पृश्यता पर महात्मा गांधी से कई वर्ष पूर्व ही सावरकर ने अपने कविता के माध्यम से ध्यान आकर्षित किया था। सावरकर ने अपनी मराठी कविता “मल्हा देवाचे दर्शन घेवू द्या” में एक निश्चित समुदाय के मंदिर प्रवेश को लेकर किये जा रहे भेदभाव के अन्याय और अपने दर्द को उजागर किया था।

सावरकर को हिन्दु समाज की गलतियां और कमियों के बारे में एहसास था। उनका मानना था कि हिन्दुओं की इन्हीं कमियों के कारण उन्हें सदियों तक गुलामी की पीड़ा सहनी पढ़ी थी। सावरकर का हिन्दू राष्ट्र का सपना समतावादी था। उनका सपना था कि सभी हिन्दू अपने विरासत को स्वीकारे और सम्मान दें साथ ही साथ सभी नागरिकों को अपने आस्था के अनुरूप जीने की स्वतंत्रता भी हो।
१९३१ में इनके प्रयासों से बम्बई में पतित पावन मन्दिर की स्थापना हुई, जो सभी हिन्दुओं के लिए समान रूप से खुला था। २५ फ़रवरी १९३१ को सावरकर ने बम्बई प्रेसीडेंसी में हुए अस्पृश्यता उन्मूलन सम्मेलन की अध्यक्षता की ।
क्रांतिकारी

स्वातंत्रवीर विनायक दामोदर सावकर , एक ऐसे क्रांतिकारी थे जिन्होंने साम्राज्यवाद के रथ पर काबिज होकर चलने वाले अंग्रेजों की क्रूरता की पराकाष्ठा झेली थी। सोने की चम्मच मुंह लेकर पैदा होने वालो को शायद अनुमान ही न हो , मगर सावरकर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास में एकमात्र ऐसे क्रांतिकारी है जिन्हे अंग्रेज़ सरकार ने दो आजीवन कारावास की सजा दी थी। उन्होंने अपनी जिंदगी के ११ वर्ष एकाकी कारावास में बिताये थे।

सावरकर ही थे जिन्होंने सबसे पहले पूर्ण स्वतंत्रता को भारत के स्वतंत्रता आंदोलन का लक्ष्य घोषित किया था।
सावरकर ही पहले व्यक्ति थे अक्टूबर 1905 को पूना की विशाल जनसभा में विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की घोषणा की थी।
सावरकर पहले व्यक्ति थे जिन्होंने १८५७ के युद्ध को स्वंतंत्रता संग्राम का नाम दिया था। जून 1908 में तैयार हो चुकी पुस्तक ‘द इंडियन वॉर ऑफ इंडिपेंडेंस-1857’ में सावरकर ने इस लड़ाई को ब्रिटिश सरकार के खिलाफ आजादी की पहली लड़ाई घोषित किया था।
वे पहले स्नातक थे जिनकी स्नातक की उपाधि को स्वतंत्रता आंदोलन में भाग लेने के कारण अंग्रेज सरकार ने वापस ले लिया।
वीर सावरकर पहले ऐसे भारतीय विद्यार्थी थे जिन्होंने इंग्लैंड के राजा के प्रति वफादारी की शपथ लेने से मना कर दिया। फलस्वरूप उन्हें वकालत करने से रोक दिया गया। ऐसा करने वाले वे एकमात्र वकील थे , सनद रहे की भारत के कई अन्य नेताओ ने भी इंग्लैंड से वकालत पास की थी जिसमे गाँधी जी और नेहरू भी थे और वे न तो वहाँ अंग्रेज़ सरकार का विरोध करने का साहस कर पाये थे , न ही अपनी डिग्री छोड़ने का दम दिखा पाये थे !!
साहित्यकार

बहुत कम लोग जानते है की सावरकर एक साहित्यकार भी थे , उनका साहित्य मराठी के करीब दस हज़ार पृष्ठ और अंग्रेजी के पंद्रह सौ पृष्ठ में सिमटा पड़ा है। उन्होंने न सिर्फ इतिहास और हिंदुत्व पर लिखा वरन कविताए , कहानिया, नाटक के अलावा और कई विषयो पर लेख भी लिखे।

हाल ही में अपनी तुष्टिकरण कि नीति के कारण कांग्रेस के राजकुमार और कम्युनिस्ट इतिहासकारो ने सावरकर के ऊपर कीचड़ उछलने की कोशिश की है।

कांग्रेस के कुछ लोग और कम्युनिस्ट विचारधारा के इतिहासकार, सावरकर के योगदान को नकारने पर तुले हुए है और इसके लिए उनकी हिंदुत्व विचारधारा और उनकी माफ़ी की अर्जी को आधार बनाते है। तोड़मरोड़ कर तथ्यों को पेश किया जाता है और उसी को आधार बना कर एक पूर्व नियोजित अर्थ सबको परोस दिया जाता है।

उनके हिंदूवादी दृष्टिकोण से निश्चित रूप से कई लोगो को आज भी समस्या है , खासकर, कांग्रेस और कम्युनिस्ट विचारधारा के उन लोगो को जिन्हे "हिन्दू" और “भारतीय संस्कृति “ से परहेज है।

जो लोग उनके हिंदूवादी होने पर उनका विरोध करते है वे शायद जानने का प्रयास ही नहीं करते कि सावरकर एक नास्तिक थे, हिन्दुत्व को एक सजातीय, सांस्कृतिक तथा राजनैतिक पहचान मानते थे। सावरकर के अनुसार हिन्दू भारतवर्ष के देशभक्त वासी हैं जो कि भारत को अपनी पितृभूमि एवं पुण्यभूमि मानते हैं। सावरकर सभी भारतीय धर्मों को शब्द "हिन्दुत्व" में शामिल करते हैं तथा "हिन्दू राष्ट्र" का अपना दृष्टिकोण पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में फैले "अखण्ड भारत" के रूप में प्रस्तुत करते हैं। सावरकर ने भारत के एक सार के रूप में एक सामूहिक "हिंदू" पहचान बनाने के लिए हिंदुत्व का शब्द गढ़ा , मगर उनके राजनीतिक दर्शन में उपयोगितावाद, तर्कवाद और सकारात्मकवाद, मानवतावाद और सार्वभौमिकता, व्यावहारिकता और यथार्थवाद के तत्व थे। सावरकर एक नास्तिक और एक कट्टर तर्कसंगत व्यक्ति थे जो सभी धर्मों में रूढ़िवादी विश्वासों का विरोध करते थे।

जो लोग सावरकर पर माफ़ी मांगने के कारण ब्रिटिश का साथ देने का आरोप लगते है वे यह भूल जाते है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान कांग्रेस ने भी, यहाँ तक कि गाँधी जी ने भी ब्रिटिश सरकार का साथ दिया था और द्वितीय विश्वयुद्ध में कांग्रेस ने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ सुभाष चंद्र बोस का साथ देने से इंकार कर दिया था!!

5 October 1917 को इंडिया के secretary of state Edwin Samuel Montagu, को सावरकर ने अपनी अपील में लिखा था कि यदि ब्रिटिश सरकार को लगता है कि ये सब में अपनी रिहाई के लिए कर रहा हू, तो सरकार बाकी सारे राजनैतिक कैदियों को रिहा करदे, इससे मुझे बेहद ख़ुशी होगी। इसमें किसी को कहाँ कायरता नज़र आती है या उनके द्वारा ब्रिटिश सरकार का साथ देने कि योजना नज़र आती है?

ये विद्वान यह भी भूल जाते है की माफ़ी तो अशफाकउल्ला और अन्य क्रांतिकारियों ने भी मांगी थी, क्योकि उस दौर के अधिकतर क्रांतिकारियों का मानना था कि देश की स्वतंत्रता के लिए जीवित रहकर और जेल से बाहर रहकर ही ब्रिटिश सरकार से संघर्ष संभव है।

जहाँ तक सवाल है कांग्रेस के लोगो द्वारा सावरकर की आलोचना की , तो इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। जिनकी दुनियाँ ही तलुए चाटते हुए बीती हो , उनसे त्याग की परिभाषा पूछना ही गलत है ।

कांग्रेस कि विचारधारा से इत्तफाक न रखने के कारण और हिंदूवादी दृष्टिकोण कि वजह से सावरकर कांग्रेस के लिए हमेशा अछूत ही रहे और कांग्रेस का पूरा प्रयास ही सावरकर के कद को कम करने में लगा रहा।

सावरकर के विरुद्ध कांग्रेस के लोगो द्वारा चरित्र हनन का कारण भी साफ है, कांग्रेस और कांग्रेस समर्थित मीडिया के इतने दुष्प्रचार के वावजूद सावरकर का जनमानस में इतना मान सम्मान इन्हे पच नहीं रहा है। कांग्रेस की भाट-चारण संस्कृति को भला ये कैसे गंवारा हो सकता कि सावरकर का कद गाँधी के अलावा कांग्रेस के अन्य नेताओ से बड़ा हो , बस इसीलिए सारे कांग्रेसी लग जाते है , सावरकर की लाइन छोटी करने में।

कांग्रेस के लोगो से मेरी अपील है कि आप मेरी जानकारी के लिए यदि बता सके तो किसी भी एक कांग्रेसी का नाम बताये , जिसे आज़ादी के संग्राम में भाग लेने के कारण फांसी हुई हो या आजीवन कारावास कि सजा सुनाई गई हो या उसने कालापानी भुगता हो? संभव हो तो राहुल बाबा के साहस और बलिदान की जानकारी ही दे दे, अगर उन्होंने कभी कोई साहित्य रचा हो या कोई सामाजिक सुधार का कार्य किया हो? या मणिशंकर अय्यर के बापदादाओ ने कभी अंग्रेज़ो के खिलाफ विद्रोह किया हो? या इन छुटभैय्ये लेखकों ने इमरजेंसी में गिरफ़्तारी दी हो, देश के लिए कोई त्याग किया हो ?

वैसे मै किसी के योगदान को कम करना नहीं चाहता मगर सत्य यह है कि आज़ादी लाखो लोगो के खून-पसीने से आयी है , हज़ारो लोगो के बलिदान का परिणाम है। किसी एक पार्टी या सिर्फ कुछ व्यक्तियों का गुणगान, उन लाखो लोगो के बलिदान का अपमान है।

अब भी समय है कि हम उन सभी महापुरुषों के बलिदान को समुचित सम्मान दे और उनके योगदान को भी बराबरी के साथ स्वीकार करे।

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