भारत में हर वो व्यक्ति जो ग्रेजुएशन कर लेता है, एक अच्छी नौकरी का ख्वाहिशमंद होता है। सही मायने में उसे जिंदगी की कठोरता का एहसास तब होता है जब वो एक सवर्ण हिन्दू परिवार में जन्म लेकर नौकरी खोजना शुरू करता है।
मुझे अगर भारत से लगाव है तो यहां की व्यवस्था से नफरत भी है। सरकारी लूट का असली खेल यहीं से शुरू होता है। भारत सरकार दलितों, पिछड़ों और कश्मीरी मुसलमानो को तो बेरोजगारी भत्ता देती ही है, साथ में किसी भी पद के लिए अप्लाई करने पर उन्हें लिए जाने वाले शुल्क ट्रेजरी चालान, बैंक ड्राफ्ट अथवा पोस्टल आर्डर से भी मुक्त रखती है। यही नहीं परीक्षा के लिए कहीं भी आने जाने वाले बस अथवा ट्रेन किराये से भी इन्हें मुक्त रखा गया है। आरक्षण की सुविधा तो जगजाहिर है ही, अतः इस पर बात करना ही फिजूल है।
यहीं पर भारत सरकार अपना दोगलापन और कमीनापन दिखाती है। दलितों, पिछड़ों और मुसलमानों को जो परीक्षा शुल्क से छूट दी गयी है, बेरोजगारी भत्ता दिया गया है, उसकी रिकवरी वो सवर्ण हिंदुओं से करती है। जितना सरकार इन लोगों पर खर्च करती है उससे कई गुना ज्यादा वो हिन्दू सवर्ण बेरोजगारों से वसूल कर राजस्व भत्ता भी बढ़ा लेती है। एक घटिया सी पोस्ट के लिए भी सरकार प्रति व्यक्ति न्यूनतम 500 रुपया ट्रेजरी चालान अथवा पोस्टल आर्डर वसूलती है। सरकार को जब अपना राजस्व बढ़ाना होता है तो वो विभिन्न विभाग में फ़र्ज़ी पदों का सृजन करती है। नौकरी की हताशा से जूझ रहा प्रत्येक व्यक्ति जैसे तैसे 500 रूपये का जुगाड़ कर फ़ार्म भरकर रजिस्ट्री अथवा कोरियर से भेजता है।
एकमात्र पद रेडियो अधिकारी के लिए मैंने खुद देखा है एक सामान्य पद के लिए अठारह लाख अभ्यर्थियों को परीक्षा देते हुए। अब सोचिये सरकार को इससे कितनी आमदनी होती होगी जबकि परीक्षा आयोजित कराने में आने वाला खर्च इसका हजारवां हिस्सा भी नहीं होता होगा।
जैसा मैंने ऊपर लिखा कि केंद्र अथवा राज्य सरकार कई बार फ़र्ज़ी पदों का सृजन भी करती है। अनेकों बार ऐसा देखा गया है कि जब सारे अभ्यथियों के शुल्क जमा हो जाते हैं, परीक्षा रद्द कर दी जाती है यदि परीक्षा हो भी जाये तो रिजल्ट घोषित नहीं किये जाते और न ही अभ्यर्थी को उसका पोस्टल आर्डर, बैंक ड्राफ्ट या ट्रेजरी चालान ही लौटाया जाता है और न ही परीक्षा रद्द होने का कारण ही बताया जाता है।
सबसे बड़े दुःख की बात तो ये है कि कोई भी व्यक्ति सरकार की इस लूट को अदालत में नहीं घसीटता। शायद आप यकीन न करें पश्चिमी देशों में, चीन, जापान, फिलपीन्स जैसे देशों में पदों के आवेदन के लिए कोई शुल्क नहीं लिया जाता। ये सारा लूटतंत्र सिर्फ भारत में ही है और इस दुर्व्यवस्था के शिकार भी अधिकतर सवर्ण हिन्दू ही हैं।
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