गांधी वध और नाथूराम गोडसे: भारत के लिए अनिवार्य शिक्षा
*************************************************
साध्वी प्रज्ञा ने एक बार फिर, एक सत्य को कुरूपता से प्रस्तुत किया है। साध्वी प्रज्ञा को यह भली भांति मालूम होना चाहिए कि वे अब सिर्फ साध्वी नही है बल्कि राजनैतिक क्षेत्र में प्रदार्पण कर चुकी बीजेपी की प्रत्याक्षी भी है। उन्हें यह सीख लेना चाहिए कि आप जब राजनीति में होते है तो सत्य की कुरूपता को हमेशा चांदी के बर्क से सजा कर प्रस्तुत किया जाता है।
गांधी जी आपको या मुझे पसन्द हो या न हो, इससे कोई फर्क नही पड़ता है लेकिन जब आप उस दल के सदस्य हो, जो न सिर्फ सत्ता में है बल्कि उसका प्रधानमंत्री, गांधी जी को सर्वजिनिक रूप से स्वीकारता और गुणगान करता है तब बहुत फर्क पड़ता है।
मैं समझता हूँ कि भारत मे गांधी जी और नाथूराम गोडसे जी को लेकर हमेशा वाद विवाद बना रहेगा। आज से कुछ दशक पूर्व तक तो सिर्फ गांधी जी की ही बात होती थी और गोडसे जी निषेधित थे। मुझे वह समय याद है जब सार्वजनिक रूप से गांधी जी की तटस्थ विवेचना या आलोचना करना ही अपराध था और भारतीय समाज उनको लेकर प्रश्न उठाये जाने को ही स्वीकार नही करता था। लेकिन हम लोगो ने पिछले 7 दशकों में इतनी दूरी तो तय कर ली है कि अब गांधी जी के निर्णयों का शवविच्छेदन व उनकी आलोचना को सार्वजनिक स्थान मिल गया है। इतना ही नही, आज नाथूराम गोडसे जी द्वारा गांधी जी के वध के कारणों पर समीक्षा व उसके परिणाम स्वरूप भारत व उसके समाज को हुये लाभ व हानि पर भी सार्वजनिक बात की जासकती है।
मेरे लिए तो इस सबसे महत्वपूर्ण यह है कि आज भारत इतना परिपक्व हो गया है कि उसने गांधी जी के महिमामण्डल से बिना छेड़ छाड किये, गांधी जी की शिक्षाओं की मीमांसा, परिणामो के आधार पर करनी शुरू कर दी है। आज गांधी जी जहां कठघरे में खड़े है, वही उनकी 'अहिंसा व शांति की शिक्षा' अपनी असफलता को लिए, आज की पीढ़ी के सूक्ष्म परीक्षण से गुजर रही है।
मैं गांधी जी की इस बात को मानता हूँ की इस दुनिया में अहिंसा व शांति से बड़ी कोई चीज नही होती है, लेकिन वह यह समझना भूल गए कि इस शांति के लिए कुछ अनिवार्य व्यवस्थाये भी होती है जिनका सभी समुदायों द्वारा पालन करना अनिवार्य है। शांति के लिए, सभी समुदायों द्वारा विचारों और आचरणों में आयी भिन्नता को समावेश करना एक महती आवश्यकता होती है।
यह व्यवस्था श्रेष्ठ है लेकिन घरातल पर यही देखा गया है कि जब किसी भी समाज मे ऐसी संस्कृति का समावेश हों जाता है जो इस भिन्नता को पूरक न मान कर, उसके मूल को ही निषेध करने की प्रवत्ति रखती है तो, शांति की कांती उतर जाती है। और जब कांती उतरती है तब शांति के सारे समीकरण ध्वस्त हो जाते है। वह आवरणहीन हो जाती है। इसी शांति की नग्नता को आवरण देने की व्यग्रता में जब लोग अहिंसा के शांति पाठ पर बैठ जाते है तो वह यह भूल जाते है कि जिस शांति की वेधशाला में आ बैठे है, वह अहिंसा की वधशाला है। यह भूल जाते है की यह 'अहिंसा का पाठ', शांति काल का पाठ है और हमेशा ही विप्लव काल में इसकी प्रसंगिकता पर प्रश्न चिन्ह ही लगते रहे है।
इस सृष्टि में अहिंसा व शांति का सत्य यही है की एक कांतिहीन शांति, अहिंसा की पराजय है और हिंसा ही अहिंसा की जय के लिए दी गयी पूर्ण आहुति होती है। आज भारत जिस काल मे है वह विप्लव काल है जो अपनी निरंतरता 1947 में दी गयी स्वतंत्रता से पहले ही बनाये हुए है। आज गांधी जी की अहिंसा व शांति की प्रसंगिकता तभी हो सकती है, जब हम हिंसा से होम करेंगे।
मैं यह इस लिए कह रहा हूँ क्योंकि गांधी जी की अहिंसा ने 1947 में भारत के 15 लाख लोगो की नरबली ली थी। शांति की अभिलाषा में भारत को हिंसा से ज्यादा रक्तपात गांधी जी की अहिंसा ने दिया है। मैं व्यक्तिगत रूप से मानता हूँ कि नाथूराम गोडसे जी के द्वारा की गई हिंसा सिर्फ एक प्रतीक है जो गांधी जी की रक्तिम अहिंसा से सर्वश्रेष्ठ है।
अब हम लोगो को अपनी पुरानी गलतियों को फिर से नही दोहराना है। हमे अहिंसा व शांति के पथ का अनुसरण भेड़ बकरियों की तरह नही करना है क्योंकि यह उनके वधशाला का मार्ग है। हमे तो यदि भारत मे संभावनाओ और शांति की स्थापना के लिए हिंसा का मार्ग सामने दिखता है तो हमे उसका ही वरण करना चाहिये।
मैं गांधी जी शांतिकाल के लिए उचित व विपल्व काल के लिए श्रापित मानता हूँ और उसी परिपेक्ष में ही मैं नाथूराम गोडसे जी का मूल्यांकन करता हूँ। यह दुर्भाग्य था कि नाथूराम गोडसे की उत्पत्ति उस भारत मे हुई थी जहां भारतीय समाज मे गांधी जी की अहिंसा व शांति की सर्वग्राह्यता थी। शायद यही कारण था कि नाथूराम गोडसे सिर्फ एकल अभिमन्यु बन कर रह गए। उनके कृत्य की आलोचना व समालोचना हमेशा ही होती रहेगी क्योंकि उनके द्वारा प्रयुक्त हिंसा पूरी तरह भवनात्मक व प्रतिशोध युक्त थी, जिसमें उनके किये कृत का भविष्य में भारत व हिन्दू हितों पर पड़ने वाले प्रभावों की कोई गम्भीर विवेचना नही की गई थी।
मुझे इस बात का हमेशा से दुख रहा है कि अपने जीवन के अस्तांचल में अपनी विचारधारा व शिष्यों से बुरी तरह पराजित व असहाय गांधी जी के वध ने उन्हें एक अमरत्व प्रदान करा दिया, जिसने भारत के भविष्य को अभी तक चोट दे रही है। मैं इसी परिपेक्ष में नाथूराम गोडसे जी द्वारा प्रयुक्त हिंसा के लक्ष्य व उसके समय निर्धारण को महत्वपूर्ण समझता हूँ क्योंकि, उससे भविष्य में भारत में हिंदुत्व व राष्ट्रवाद को हुये लाभ व क्षति पर शास्त्रार्थ हमेशा समकालीन रहेगा।
Comments
Post a Comment