पुरुष चार हजार व स्त्री लाख बार सम्भोग से गुजर सकती है:
----------------------------------------------------------------------- एक पुरुष अपने जीवन में साधारण स्वस्थ पुरुष चार हजार संभोग कर सकता है करता है। चार हजार बार काम के अनुभव से गुजरता है एक पुरुष। स्त्री तो लाख बार गुजर सकती है। उसकी क्षमता गहन है। इसलिए पुरुष वेश्याएं नहीं हो सके स्त्रियां वेश्याएं हो सकीं।
लाख बार भी काम के अनुभव से गुजरकर यह पता नहीं चलता कि यह काम-ऊर्जा यह सेक्स एनर्जी क्या है? क्योंकि हम कभी काम पर ध्यान नहीं करते कभी हम सेक्स पर मेडिटेशन नहीं करते
इस जगत में जो भी ज्ञान उपलब्ध होता है वह ध्यान से उपलब्ध होता है जो भी ज्ञान चाहे विज्ञान की प्रयोगशाला में उपलब्ध होता हो और चाहे योग की अंतःप्रयोगशाला में उपलब्ध होता हो। जो भी ज्ञान जगत में उपलब्ध होता है वह ध्यान से उपलब्ध होता है। ध्यान ज्ञान को पाने का इंस्ट्रूमेंट, उपाय, विधि, मेथड है ।
कभी आपने ध्यान किया है सेक्स पर?
चिंतन तो किया है ध्यान नहीं किया चिंतन का अर्थ है जो भीतर वासना घटती है उसके साथ ही बह जाते हैं दूर खड़े होकर देख नहीं पाते। मन में उठा काम का विचार तो आप भी काम के विचार के साथ आइडेंटिफाइड हो जाते हैं तादात्म्य हो जाता है। आप ही काम हो जाते हैं, यू बिकम दि सेक्स। फिर ऐसा नहीं होता कि काम की ऊर्जा उठी है मैं दूर खड़ा देखता हूं क्या है?
एक वैज्ञानिक प्रयोगशाला में प्रवेश करता है परीक्षण करता, खोज करता, प्रयोग करता, निरीक्षण करता, दूर खड़े होकर देखता, क्या हो रहा है? अगर वैज्ञानिक जो कर रहा है, उसके साथ आइडेंटिफाइड हो जाए जैसे एक वैज्ञानिक एक केमिकल पर एक रासायनिक द्रव्य पर खोज कर रहा है। वह खुद को ही समझ ले कि मैं ही रासायनिक द्रव्य हूं तो हो गई खोज फिर कभी नहीं होगी। वह आदमी ही खो गया जो खोज कर सकता था।
जिसे विज्ञान आब्जर्वेशन कहता है निरीक्षण कहता है उसे ही योग धर्म ध्यान कहता है वह धर्म की पारिभाषिक शब्दावली ध्यान है। ध्यान का मतलब है जो भी देख रहे हैं उससे दूर खड़े होकर देख सकें टु बी ए विटनेस। एक गवाह की तरह देख सकें सम्मिलित न हो जाएं
जिस इंद्रिय के साथ आपका एकात्म हो जाता है उसे आप कभी न जान पाएंगे जिस इंद्रिय के रस के साथ आप इतने डूब जाते हैं कि भूल जाते हैं कि मैं देखने वाला हूं बस फिर ध्यान नहीं हो पाता फिर कभी इंद्रियों के रस का ज्ञान नहीं हो पाता क्रोध उठे, तो क्रोध से जरा दूर खड़े होकर देखें क्या है?
लेकिन हम भगवान पर तो ध्यान करते हैं जिसका हमें कोई पता नहीं जिसका हमें पता नहीं उस पर ध्यान होगा कैसे ध्यान तो उस पर हो सकता है जिसका हमें पता है। भगवान पर ध्यान करते हैं जिसका हमें कोई पता नहीं है। क्रोध पर काम पर कभी ध्यान नहीं करते जिसका हमें पता है। और मजा यह है कि जो काम क्रोध और बाकी इंद्रियों के समस्त उपद्रव के प्रति ऊर्जा के प्रति विस्फोट के प्रति ध्यान करने में समर्थ हो जाता है जैसे-जैसे उसका ध्यान बढ़ता है इंद्रियों पर वैसे-वैसे इंद्रियां विजित होती चली जाती हैं हारती चली जाती हैं वह जीतता चला जाता है उतना रिकवर करता चला जाता है उतनी जमीन वापस लेता चला जाता है उतनी-उतनी इंद्रिय अपनी ताकत छोड़ती चली जाती है जहां-जहां ध्यान की किरण प्रवेश कर जाती है
क्रोध को जिसने जान लिया वह क्रोध नहीं कर सकता। काम को जिसने जान लिया वह कामातुर नहीं हो सकता लोभ को जिसने जान लिया वह लोभ में नहीं पड़ सकता अहंकार को जिसने पहचाना वह अहंकार के बाहर है।
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