दस साल एक तेज तर्राक प्रधानमंत्री को गूंगा बनाए रखा अब एक पप्पू जैसे गूंगे को चुप रहना चाहिए वो बोले जा रहा है

बयंग बाण!
जब चीन ने 2007 में एन्टी सैटेलाइट मिसाइल से अंतरिक्ष मे अपने ही मौसम उपग्रह को मार गिराने का प्रदर्शन किया तो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) और  रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन  ( डीआरडीओ) के  वैज्ञानिकों ने तत्कालीन प्रधानमंत्री "मनमोहन सिंह" से ये अनुरोध किया कि उन्हें भी दुनिया को खासकर चीन को  सख्त संदेश देने के लिए ऐसी ही तकनीक का परीक्षण करने की अनुमति दी जाये तो उनका कलेजा कांप गया पर संभालते हुए बोले कि "मैडम सोनिया से पूछ कर बताऊंगा ।"
सरदार जी जब "सोनिया" से पूछने 10 जनपथ गए तो वहां पहले से ही मौजूद राहुल बाबा आस्तीन चढ़ाये बैठे थे । सरदार जी ने डरते डरते वैज्ञानिकों की मांग बताई तो "बाबा" आग बबूला हो उठे और अपने कुर्ते से बाहर निकलने की कोशिश करने लगे । उन्होंने डांट के सरदार जी को चुप करा दिया और गुस्से में वहां जो भी कागज पत्तर पड़े थे सब फाड़ डाले फिर भी उनका गुस्सा शांत नही हुआ  और जब कुछ नहीं बचा फाड़ने को तो अपना ही कुर्ता पैजामा  फाड़ने पर उतारू हो गये ।
सकपकाये सरदार जी ने अपनी आसमानी पगड़ी संभालते हुए वहां से फौरन नौ दो ग्यारह होने में ही अपनी भलाई समझा और किसी तरह हांफते हांफते- गिरते पड़ते पीएमओ पहुँच सोफे पर निढाल हो गए  ।
और तो और   "सोनिया मैडम" भी  कमजोर दिल वाली निकलीं और ऐसी बेतुकी मांग सुन कर रात भर रोयीं औऱ शॉक लगने की वजह से उनको एक गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया जो सामान्यतया उन जैसी संन्यासी, त्यागी प्रवृत्ति और एकांकी जीवन  जीने वाली स्त्रियों को नही होता ( बीमारी का नाम देशहित में सार्वजनिक नही किया जा सकता ) और उन्हें अमेरिका में इलाज कराने के गुप्त मिशन पर रवाना होना पड़ा ।

संसद भी चिंतित हो उठी और "आडवाणी" तथा "सुषमा स्वराज" ने फौरन मैडम के स्वस्थ होने का प्रस्ताव पेश कर दिया जिसे कभी भी संसद न चलने देने और हर बिल में अड़ंगा डालने वाले नेताओं ने भी दिन भर चर्चा के बाद एकमत से पारित कर दिया ।

फिर तो पूरा देश चिंतित हो गया साहब ! मीडिया ने जगह जगह सर्वधर्म प्रार्थना सभा होने की खबर प्रसारित करना शुरू कर दिया तो उधर दूरदर्शन और आल इंडिया रेडियो वाले "बिस्मिल्ला खां" की शहनाई की उस धुन का टेप तलाशने में जुट गये जो कभी नेहरू, इंदिरा के लिए 13 दिन तक बजाये गये थे । ये अलग बात है कि जब "फिरोज जहांगीर घंडी" दिवंगत हुए थे तब "बिस्मिल्लाह खां" शहनाई नही बल्कि तबला बजाते थे ।
     
सारे दरबारी और पुरस्करों के दावेदार तंखाईया लेखकों,  पत्रकारों ,अल्पसंख्यक-मसीहाओं और गरीब-दलित चिंतको में भी असुरक्षा की लहर दौड़ गयी और कहीं नम्बर न कट जाये इसलिए सभी में गुपचुप मोमबत्ती खरीदने की होड़ लग गयी  , जाने किस घड़ी इंडिया गेट से लेकर राजघाट तक मोमबत्ती मार्च की नौबत आ जाये और तब ऑफर तफरी के माहौल में मोमबत्ती मिले न मिले ।

दिग्विजय , अहमद पटेल, शिवराज पाटिल, गुलाम नबी आजाद, अम्बिका सोनी आदि जैसे कई वफादारों  ने तो अवसर के अनुरूप रूप रचने के लिए झक सफेद धोती कुर्ता, काली शेरवानी-जालीदार टोपी, प्रिंस सूट ,साड़ी-मैचिंग ब्लाउज, बुरका जैसे वस्त्र के आर्डर भी दे दिए ।

    कुछ अति उत्साही कांग्रेसियों ने तो हिंदुत्व की राजनीति की काट के लिए टनों चंदन की लकड़ी की व्यवस्था के लिए  वीरप्पन के बचे खुचे गैंग से संपर्क करने के लिए कर्नाटक के मल्लिकार्जुन खड़गे को काम पर लगा दिया ।

उत्साही कांग्रेसियों की इस हरकत से व्यथित  ऑस्कर फर्नांडिस अंदरखाने ईसाई धर्म को बचाने के लिए चौकन्ने हो उठे और फौरन देश विदेश के सैकड़ों पादरियों को बाइबिल और क्रॉस के साथ मे तैयार रहने के लिए संपर्क साधा यहां तक कि हड़बड़ाहट में उन्होंने वैटिकन सिटी में रह रहे "पोप बैंडिक्ट" का फोन भी खड़खड़ा डाला ।

अपने ठहाकों के लिए मशहूर 'रेणुका चौधरी' जैसी नेताओं और रेखा जैसी समाजसेविकाओं ने देश को भावुक करने के लिए 'इम्पोर्टेड ग्लिसरीन' अपने अपने पर्स  में रख लिये ।

उधर कपिल सिब्बल के पास इन सब की कोई खबर ही नही थी  क्योंकि वो मैडम सोनिया द्वारा ही सौंपी जिम्मेदारियों को पूरा करने में तल्लीन थे । राम के अस्तित्व को नकारने के लिए शपथपत्र तैयार करने और टू जी घोटाला, कोयला घोटाला , कॉमन वेल्थ घोटाला, रक्षा सौदों के घोटाले से परिवार पर कोई दाग न आये इसलिए सारे आरोपियों को बचाने के लिए सुप्रीम कोर्ट के मुकदमों की फाइलों के नीचे "सिब्बल साहब" दबे पड़े थे यहां तक उन्हें खाने पीने और दैनिक क्रिया के लिए भी फुर्सत नही थी ।

उन्ही दिनों भारत मे कमजोर सरकार के चलते पाकिस्तान के हौसले बुलंद थे और उसकी हिमाकत भी बढ़ी हुई थी और भारत के विभिन्न हिस्सों में एक के बाद एक आतकंवादी हमलों की झड़ी लगी हुई थी ।

    इन घटनाओं में न केवल देश के सुरक्षा बलों के बहादुर जवान शहीद हो रहे थे बल्कि बेकसूर नागरिक भी आतंकवाद का भेंट चढ़ रहे थे ।
जब भारतीय सेनाओं ने पाकिस्तान को सबक सिखाने के लिये उसपर सर्जिकल स्ट्राइक करने की अनुमति तत्कालीन रक्षा मंत्री "ए के अंटोनी" से  मांगी तो हमारे बहादुर रक्षा मंत्री की पोंक सरक गयी और वो लुंगी संभालते संभालते मूर्छित हो वहीं ऐसे ढेर हो गए जैसे महाभारत काल के यक्ष  ने सरोवर पर पानी पीने आये पांडवो से कोई सवाल पूछ दिया हो । ऐसे में सेना के अफसर और जवान सर्जिकल स्ट्राइक भूल इस नई आयी आफत को संभालने में जुट गये .....

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