छटपटाने की बजाय शांत चित्त होकर धैर्य धारण करना चाहिए

,,,जीवन में एक समय एैसा आता है जब इंसान का उसके जीवन में बहुत सी घट रही घटनाओं पर नियंत्रण नहीं रह जाता है,,,
                    जबकि एक समय पहले इंसान सक्षम होता है उनको नियंत्रित करने में,,,बस यही वो समय होता है जब सबसे अधिक याद करता है वो अपने आराध्य का,,,
                     और मेरा मानना है कि ये वही समय है जब छटपटाने की बजाय शांत चित्त होकर धैर्य धारण करना चाहिए,,,अपने अंदर की सहनशक्ति को उत्प्रेरित करना चाहिए,,,मनन करना चाहिए और आने वाली चुनौती का सामना करने के लिए स्वयं को और मजबूत बनाना चाहिए,,,
       यही तो मूल मंत्र है,,, स्वयं को कभी निराशा की गर्त में नहीं गिरने देना चाहिए,,, बहुत से एैसे लोग एैसे दोस्त होते हैं जो छोड़ जाते हैं आपको अप्रत्याशित रूप से उस समय जब आपको उनकी सबसे ज्यादा आवश्यकता होती है,,,परंतु कभी हार नही मानना चाहिए,,,
    याद रखिएगा नैराश्य का यही भाव आपको पहले हरायेगा फिर गिरायेगा और अंत में मिटायेगा,,,उन सबको धन्यवाद कहें जो आपके साथ रहें हैं और उनको तो और जिन्होंने आपका साथ विपरीत परिस्थिति में छोड़ दिया,,,क्यूंकि वही सबसे बड़ी प्रेरणा होते हैं आपके अंदर समस्याओं से जूझने की शक्ति का संचार करने में,,,
        और अंत में महाकवि मैथलीशरण गुप्ता जी के शब्दों में चंद पंक्तियां जो आपको प्रेरणा देंगी और जूझने की ताकत देंगी,,,,
   
      विचार लो कि मर्त्य हो न मृत्यु से डरो कभी,,,!!!
        मरो परन्तु यों मरो कि याद जो करे सभी,,,!!!
हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिए,,,!!!
मरा नहीं वहीं कि जो जिया न आपके लिए,,!!!
       यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे,,,!!!
        वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे,,,!!!
"ठाकुर की कलम से"

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