"खुशियों के टावर"
{29 मई 2010 उनकी शादी की सालगिरह}
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“हम इतना काम क्यों कर रहे हैं? हम इतना काम करेंगे तो लोगों को हमारी ज़रूरत ही नहीं रहेगी। उन्हें कभी हमारी याद भी नहीं आएगी।”
“हम इतना काम इसीलिए कर रहे हैं। ताकि लोगों को हमारी याद कभी आए ही नहीं।”
मेरी तरह आपने भी एक फोन कंपनी का ये विज्ञापन देखा ही होगा।
विज्ञापन में यही दिखलाया गया है कि दो आदमी फोन नेटवर्क दुरुस्त रखने के लिए जगह-जगह मोबाइल टावर लगा रहे हैं। वहीं दोनों के बीच की बातचीत का अंश ये है कि हम इतना काम इसीलिए करते हैं ताकि कोई हमें याद करे ही नहीं।
ज़ाहिर है कि जब फोन नेटवर्क में कभी तकलीफ आएगी ही नहीं, तो फिर उसे याद करने की क्या ज़रूरत? बहुत छोटी-सी इस बातचीत का भाव बहुत गहरा है।
आदमी किसी को याद ही तकलीफ में करता है।
कबीर ने बहुत पहले इसी भाव को इस तरह व्यक्त किया था-
“दुःख में सुमिरन सब करे सुख में करै न कोय।
जो सुख में सुमिरन करे दुःख काहे को होय॥”
मतलब आदमी ईश्वर को भी दुख में ही याद करता है। जब तक वो सुखी रहता है, उसे उसकी याद नहीं आती। पर जैसे कोई तकलीफ हुई, उसे तुरंत ईश्वर की याद आने लगती है।
पर कबीर ने इसके आगे जाकर ये भी कहा है कि अगर आदमी सुख में उसे याद करे, तो उसकी ज़िंदगी में कभी दुख आएगा ही नहीं।
वाह! कितनी गहरी बात है। हम अक्सर अपने बहुत से रिश्तों को बस ज़रूरत के समय पर याद करते हैं। बाकी समय वो रिश्ता घर के कोने में कहीं पड़ा रह जाता है।
कई बार हम ये सब जानबूझ कर करते हैं, कई बार हम अनजाने में करते हैं। हम अपने बारे में बहुत बार सोचते हैं, पर हम उनके बारे में नहीं सोचते हैं, जिनके किए की वजह से हम जो हैं, वो हैं। हम उन्हें बहुत कम बार याद करते हैं, जो हमारी ज़िंदगी की नींव होते हैं।
हम उन्हें बहुत बार याद करते हैं, जिनकी वजह से हमें तकलीफ होती है, पर जिनकी वजह से हम खुश हैं, उन्हें अक्सर भूल जाते हैं। यकीनन आप सोच रहे होंगे कि हम आज किस ज्ञान को उड़ेलने को बेताब हैं?
आप ये भी सोच रहे होंगे कि हम एक विज्ञापन में ज़िंदगी क्यों तलाशने बैठ गए हैं?
सोचिए। सोचना ही चाहिए।
हम ऐसे ही कुछ भी कभी नहीं कहते। वो ज़िंदगी के मर्म को समझते हैं और उसे अपने परिजनों तक पहुंचाते हैं।
मैं बार-बार मां को याद करता हूं। कई लोग टोकते भी हैं कि आप कभी बड़े नहीं होंगे। वो मां के पल्लू को पकड़ कर उसी से लिपटे रह जाएंगे। हो सकता है मैं कुछ न कर पाऊं? हो सकता है मैं कभी बड़ा भी न हो पाऊं, पर मैं उसे हर पल याद ही इसीलिए करता हूं क्योंकि मैं मानता हूं कि मैं जो हूं, उसी की वज़ह से हूं। मैं उसे अच्छी यादों में जीता हूं। मैं उस विज्ञापन के विरुद्ध जाकर जीता हूं, जिसमें कहा गया है कि तकलीफ नहीं होने पर लोग याद नहीं करते।
हो सकता है कि बहुत से रिश्तों में ये सच भी हो।
छोड़िए इन बातों को। आज मुझे आपको एक स्वप्न सुन्दरी परी की कहानी सुनानी है। जो कालांतर में मेरी जीवनसंगिनी बनी।
बहुत साल पहले मुझे एक परी मिली थी। वो ज़मीं पर आ तो बहुत पहले गई थी, लेकिन मुझे मिली तब जब मैं बड़ा हो चला था।
30 मई 2010 को वो परी मेरे आंगन की तुलसी बनकर आई। तब मैं जिन्दगी के संघर्षों से दो चार हो रहा था
उस दिन वो मेरे सामने खड़ी थी। ये सब होनी की तरह था।
मैं याद करने बैठूंगा तो मुझे एक-एक दिन की कहानी याद आ जाएगी।
पर मुझे आज वो सब नहीं याद करना। आज तो मुझे सिर्फ इतना बताना है कि जब से वो मेरी ज़िंदगी में आई, उसने मेरी ज़िंदगी को बहुत आसान बना दिया है। इतना आसान कि मुझे पता ही नहीं चला कि वो बीते साल कब और कैसे गुजर गए?
बहुत साल पहले पीले रंग के साड़ी में मिली वो परी उस शादी की रात की मुलाकात के बाद मेरी ज़िंदगी में समाहित हो गई थी।
तब से न जाने कितने साल बीत गए।
वो मेरी पत्नी बन कर मेरी ज़िंदगी में आई और कब मां बन गई, कब मैं एक बेटी का सौभाग्यशाली बाप बन गया पता भी नहीं चला।
उसने मेरी जिंदगी में खुशियों के इतने टावर लगा दिए कि मुझे कभी किसी बात की तकलीफ हुई ही नहीं। और अगर कभी हुई भी तो उसे दिनचर्चा समझ कर सहर्ष स्वीकार किया।
आज कुछ और नहीं कहना। बस सोचना है कि हम उन्हें कितना याद रखते हैं, जो हमारी मुश्किलों को हर लेते हैं।
मैं भी सोचूंगा। आप भी सोचिए। उनके बारे में सोचिए, जिन्होंने आपकी ज़िंदगी मे खुशियों के टावर लगा दिए।
मेरी ज़िंदगी में खुशियों के टावर लगाने वाली का 29 मई को शादी का सालगिरह है। उनको मेरी ओर से एडवांस शादी की सालगिरह की बधाई।
"ठाकुर की कलम से"
रविकांत ठाकुर
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