कठिन समय में अर्जुन के जोश से नहीं बल्कि श्रीकृष्ण के होश से काम लेना चाहिए
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महाभारत का युद्ध चल रहा था, कौरवों चक्रव्यूह में फंसाकर अभिमन्यु की हत्या कर दी थी. जब अर्जुन को इस बात का पता चला कि - 8 योद्धाओं ने निहत्थे अभिमन्यु को घेर कर मारा है तथा जयद्रथ ने अभिमन्यु के शव के साथ बरबर्ता की है तो अर्जुन को क्रोध आ गया.
अर्जुन ने प्रतिज्ञा की कि - कल सूर्यास्त से पहले जयद्रथ का बध कर दूंगा और अगर ऐसा नहीं कर सका तो अग्नि समाधि ले लूँगा.
कौरवों को अर्जुन की प्रतिज्ञा का पता चला तो अगले दिन द्रोणाचार्य ने 'कमल व्यूह' की रचना की और उसमे जयद्रथ को छुपा लिया.
सबको पता था कि- अगर अर्जुन जयद्रथ को नहीं मार सका, तो वह आत्मदाह कर लेगा और अर्जुन की मौत के साथ ही महाभारत कौरब जीत जायेंगे. सभी कौरव योद्धा इस कोशिश में लग गए कि - किसी भी तरह से अर्जुन को जयद्रथ तक पहुँचने न दिया जाए.
कृष्ण ने अर्जुन से कहा तुम रास्ता साफ़ करो मैं रथ को लेकर आगे बढ़ता हूँ. लेकिन उस दिन एक तो सभी कौरव अर्जुन को रोक रहे थे और दूसरी तरफ अर्जुन के निशाने भी लागातार चूक रहे थे. इसलिए वे किसी भी प्रकार से जयद्रथ के आस पास भी नहीं पहुँच पाए.
संध्या होने का आई तब श्रीकृष्ण ने एक जगह रथ को रोका और कहा घोड़े बहुत थक गए हैं. इस पर अर्जुन ने कहा - केशव यह क्या हो रहा है ? तब श्रीकृष्ण ने जबाब दिया - मैंने युद्ध के पहले दिन ही उपदेश दिया था कि - कोई भी कार्य अच्छी तरह सोंच कर करो.
तुमने यह प्रतिज्ञा क्यों की, कि - यदि जयद्रथ को न मार राका तो अग्नि समाधि ले लूंगा ? अब तुम्हारी एक निगाह जयद्रथ को ढूंढ रही है और दुसरी निगाह सूर्य पर है. इसीलिए तुम्हारे ध्यान भटक रहा है और तुम्हारे निशाने चूक रहे हैं.
दुसरी तरफ कौरवों को भी तुम्हारी प्रतिज्ञा का पता है इसलिए वे युद्ध करना छोड़कर केवल जयद्रथ को बचाने में लगे हैं. अगर तुमने कल यह प्रतिज्ञा नहीं की होती तो तुम अब तक जयद्रथ का बध कर चुके होते, लेकिन अब इतनी मुश्किल हो रही है.
श्रीकृष्ण के इस उपदेश का सार यह है कि - संघर्ष के समय जल्दबाजी में ऐसा कोई निर्णय नहीं लेना चाहिए जिसमे असफल होने पर खुद का विनाश होने की संभावना हो. पुलवामा काण्ड के बाद भी कई लोग ऐसी विवेकहीन प्रतिज्ञाएँ कर रहे है-
जैसे -
370 नहीं हटी तो समर्थन नहीं,
पापिस्तान पर तुरंत हमला नहीं किया तो समर्थन नहीं,
कश्मीर में पत्थरबाजों पर टैक चलवाओ बरना समर्थन नहीं,
40 सैनिको के बदले 400 पपिस्तानियों के सर लेकर आओ वरना समर्थन नहीं, ....
यह सब वैसी ही प्रतिज्ञाएँ है जैसी अर्जुन ने की थी. इस समय अर्जुन की तरह विवेकहीन प्रतिज्ञाएं करने की नहीं बल्कि श्रीकृष्ण की तरह सुझबूझ से फैसला लेने की आवश्यकता. तब ही हम इस भयानक समस्या का स्थाई हल निकाल पायेंगे.
हौसला रखिये, हमारा नेतृत्व सक्षम है और सेना सुद्रढ़ है. शत्रु को सबक अवश्य सिखाया जाएगा लेकिन इस तरह से कि सारी दुनिया ही पापिस्तान को गलत कहे और भारत का साथ दे. इसके अलावा भारत को बहुत ही कम हानि उठानी पड़े.
यह ठीक है कि - सैनिको की मृत्यु से हम भावनाओं में बहक रहे हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम शत्रु का नुकसान करने के बजाय अपना ही नुकसान करा बैठे. अपने नेत्रृत्व पर भरोसा रखिये. पापिस्तान पर कार्यवाही होगी और जरुर होगी।
लेकिन इस तरह से कि सारी दुनिया भारत के साथ होगी. इसके अलावा दुसरी तरफ से ईरान और पापिस्तान के अंदर के असंतुष्ट भी, भारत का साथ देंगे. भारत के इरादों का खौफ पापिस्तान के नेतृत्व के चेहरे पर कल आपने देखा ही होगा.
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