जवाब मिल गया

जवाब मिल गया
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कहानियां जीवन दर्शन का एक अध्याय होती हैं। समय पर उन्हें याद कर लेने से जीवन की राह आसान हो जाती है।
असल में मैं जब कहीं जाता हूं तो वहां के माहौल में खुद को आत्मसात करने की कोशिश करता हूं। पिछले दिनों मैं एक परिचित के घर गया था। वहां एक पारिवारिक कार्यक्रम था। मेरे परिचित के बहुत से रिश्तेदार वहां आए थे। थोड़ी देर तक तो सब ठीक रहा, फिर मैंने देखा कि अधिकतर लोग अलग-अलग समूह में बैठ कर एक-दूसरे की शिकायत कर रहे थे।
एक आदमी कह रहा था कि फलां ने जो किया वो उन्हें अच्छा नहीं लगा। कोई दस साल पुरानी किसी बात की बखिया उधेड़ रहा था।
जितने लोग, उतनी बातें।
मैं जब इस कार्यक्रम में आया था, तो ये देख कर बहुत खुश था कि लोगों की आपस में इतनी बनी हुई है, कितनी अच्छी बात है। ऐसे कार्यक्रम होते रहने चाहिए। लोगों में प्रेम बना रहता है। रिश्ते बने रहते हैं।
पर यहां तो कुछ ही समय बाद माहौल भारी होने लगा।
मेरे परिचित अचानक मेरे पास आए और उन्होंने मुझसे कहा कि रवि जी, मन बहुत उदास है। हमारे ये रिश्तेदार आपस में एक-दूसरे से पुराना हिसाब-किताब करने बैठ गए हैं। मुझे लगा था कि मांगलिक कार्यक्रम है, लोग आएंगे तो अच्छी-अच्छी बातें करेंगे, पर यहां तो उल्टा ही हो रहा है। सबके मन के मैल बाहर निकल रहे हैं। लोग पता नहीं कब की बातें उठा कर एक-दूसरे को ताने दे रहे हैं।
मैंने देखा कि इस कार्यक्रम में जितने लोग आए थे, सब ठीक-ठाक घर के लोग लग रहे थे। फिर इनके मन में इतनी मलीनता क्यों? आदमी इतने-इतने वर्षों के बाद किसी पारिवारिक उत्सव में एक-दूसरे से मिलता है, फिर  वो उसका आनंद क्यों नहीं उठाता? वो एक-दूसरे को नीचा क्यों दिखलाने लगता है?
क्या है असली समस्या?
मैं सोच ही रहा था कि अपने परिचित को क्या जवाब दूं। अचानक मुझे मां की सुनाई बहुत पुरानी एक कहानी याद आ गई।
मां ने मुझे उस संत की कहानी सुनाई थी जिसे अपने साथ एक धार्मिक यात्रा पर ले जाने के लिए कई लोग आए थे। संत ने कहा था कि वो धार्मिक यात्रा पर फिलहाल नहीं जा सकते। पर उन्होंने एक कद्दू उन लोगों को दिया और कहा कि आप इसे साथ ले जाइए।
कद्दू?
संत ने कहा कि इस कद्दू को आप साथ ले जाइए। इसे आप सारे धार्मिक स्थान के दर्शन कराइएगा और जहां आप गंगा में डुबकी लगाएं तो इसे भी डुबकी लगवा दीजिएगा।
लोगों ने कुछ कहा नहीं। बस संत के दिए कद्दू को साथ लेकर चले गए।
कुछ दिनों के बाद वो जब लौट कर आए तो कद्दू साथ लेकर आए। उसे संत को देते हुए उन्होंने कहा कि महाराज, इस कद्दू ने सारे धार्मिक स्थान के दर्शन कर लिए हैं। कई बार गंगा में डुबकी भी लगा चुका है। पर प्रभु आप चलते तो बहुत अच्छा रहता।
संत मुस्कुराए। उन्होंने कुछ कहा नहीं। बस सभी शाम को भोजन के लिए उन्होंने सभी को बुला लिया। शाम को उसी कद्दू की सब्जी बनी।
सब खाने पर बैठे। ये क्या कद्दू की सब्जी तो एकदम कड़वी थी। सब थू-थू करने लगे।
सबने कहा, “प्रभु, ये कद्दू तो एकदम कड़वा है।”
संत ने कहा, “ ये कद्दू कड़वा ही था। तभी तो मैंने इसे आपके साथ तीर्थ पर भेजा था। गंगा स्नान भी करवाया था। मुझे लगा था कि शायद इससे इसकी कड़वाहट मिट जाएगी।”
लोग चुपचाप उन्हें देखते रहे।
संत ने आगे कुछ भी नहीं कहा। बस मुस्कुराते रहे।
लोग समझ गए कि संत क्या कहना चाह रहे हैं।
पूरी कहानी सुनने के बाद मेरे परिचित ने मुझसे कहा, “रवि जी, जवाब मिल गया।

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