#विषाक्त_मानसिकता
भारी मात्रा में विस्फोटक से भरे वाहन को दो हजार पांच सौ से अधिक सीआरपीएफ जवानों के काफिले से टकरा देने वाला फिदाइन आखिर अपनी जान देकर उन लोगों की जान क्यों लेना चाहता था, जिन्हें वह जानता तक नहीं था। इस मानसिकता को किस विचारधारा ने जन्म दिया ? 1999 में जन्मा आदिल अहमद डार पुलवामा के ही काकपोरा का निवासी था और 12वीं कक्षा में पढ़ रहा था। आतंकी बनने से पहले वह एक स्थानीय आरा मशीन पर काम करके लकड़ी की पेटियां बनाता था और मार्च 2018 में उसने आतंकवाद की राह पकड़ ली। प्रारंभ में वह जिहादी जाकिर मूसा के साथ रहा फिर जैश-ए-मोहम्मद का हिस्सा बन गया। जहां पाकिस्तान स्थित जैश-ए-मोहम्मद के आतंकी कामरान गाजी ने उसे प्रशिक्षण दिया। यही गाजी गत दिवस सेना के हाथों मारा गया।
आखिर आदिल मरने मारने को क्यों तैयार हो गया ? पुलवामा हमले से पहले उसके द्वारा बनाए वीडियो संदेश से ही काफी हद तक उसका खुलासा हो जाता है। वह कहता है, "अभी मैंने अपने हिस्से का कर्ज और फर्ज अदा किया है। अपनी जान का नजराना पेश करके उम्मत (इस्लामी जगत) का सिर फिर से बुलंद किया है। मुझ जैसे हजारों लोग तुम्हारी (भारत की) तबाही का सामान लिए अपनी मंजिल को पाने के लिए बेताब बैठे हैं। हमारा जिहाद गजवा-ए-हिंद की मुबारक कड़ी है। जिसे तोड़ना तुम गाय का पेशाब पीने वालों के बस की बात नहीं। हम हर दिन पहले से अधिक ताकतवर हो रहे हैं। हमारी शहादत इस्लाम के लिए कुर्बानी है।" आदिल जैसे जिहादियों का दर्शन अन्य धर्मावलंबियों को 'काफिर-कुफ्र' घोषित करता है। इस विध्वंसक मानसिकता को भारत सदियों से झेल रहा है। चाहे वह आठवीं शताब्दी से विदेशी आक्रांताओं द्वारा लूटपाट, मंदिरों को ध्वस्त, मतांतरण और गैर-मुस्लिमों की हत्या हो या फिर 19वीं शताब्दी में भारतीय उपमहाद्वीप में मुस्लिम अलगाववाद का बीजारोपण हो या फिर 1946 में बंगाल में सीधी कार्यवाही और 1947 में भारत का रक्तरंजित विभाजन। उन्नीस सौ अस्सी-नब्बे के दशक में घाटी से कश्मीरी पंडितों का पलायन हो या फिर कालांतर में जैश-ए-मोहम्मद, अल क़ायदा, लश्कर-ए-तैयबा और इंडियन मुजाहिद्दीन जैसे आतंकी संगठनों का जन्म।
सभ्य समाज दशकों से इस विषय में चिंतन पर ईमानदार चर्चा करने से बच रहा है। यह उसका ही परिणाम है कि उस विषबेल ने आज पूरे विश्व को जकड़ लिया है।
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