जैसा भी हूँ मुझे स्वीकार करो

धर्म नई दौड़ नहीं,इस सत्य की स्वीकृति है कि मैं जैसा भी हूं,हूं।अन्यथा होने का कोई उपाय नहीं।
अशांत हूं तो अशांत,
बेईमान हूं तो बेईमान,
चोर हूं तो चोर,
किया क्या जा सकता है?
और चोर यदि अचोर होने का प्रयास करेगा तो उसमें भी चोरी कर जायेगा।क्योंकि चोर......कोशिश तो चोर ही करेगा।
सत्य की पहली घटना है,पूर्णरूपेण,पूरी नग्नता में जैसा भी है मनुष्य;उसे स्वीकार कर लेना है।बदलाहट,रूपांतरण इसके पीछे चला आता है।जैसे ही मनुष्य अपनी बुराई को स्वीकार कर लेता है,वह पाता है कि बदलाहट शुरू हो गई।उसे बदलाहट करनी नहीं पड़ती।
यदि मनुष्य पूर्णरूपेण स्वीकार कर लेता है कि मैं झूठा हूं,और इसके विपरीत मनुष्य जरा भी लक्ष्य नहीं बनाता कि सच बोलूंगा;तो झूठ बचेगा नहीं।
क्यों?
क्योंकि जहां पूर्ण स्वीकृति है,जहां इतनी सच्चाई है कि मनुष्य ने अपने पूरे झूठ को स्वीकार कर लिया है;इससे बड़ी सच्चाई और क्या हो सकती है,कि स्वयं का चोर होना,हिंसक होना,बेईमान होना मनुष्य ने स्वीकार कर लिया।सत्य का पहला कदम उठ गया।
जैसे दीये के जलने पर अंधेरा तिरोहित हो जाता है-इस सच्चाई के सामने झूठ स्वयमेव तिरोहित हो जाता है।

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