अय्प्या मंदिर प्रकरण पर भारत के शंकराचार्य किस गुफा में छिपे हुए है .ये महा मंडलेश्वर ..एक लाख आठ श्रेणी वाले पंडे कहा सोये हुए है .ये हिन्दू धर्म के ठेकेदार कहाँ खो गए .....................आगामी कुम्भ में जाकर बड़ी बड़ी दुकाने सजाने वाले ....शाही स्नान में सबसे पहले स्नान करने की जिद करने वाले ....हांथो मे तलवार .जिस्म पर भभूत लगाये करोडो नागा साधुओ की तलवारे किस म्यान में घुस गयी ...........बड़े बड़े उतंड प्रवचन देने वाले विशाल तिलकधारी कहाँ है ?...................कहा है वह गुजरात का दोगला कागजी शेर तोगडिया...............?.क्यों नही इलाहावाद के कुम्भ से पहले ये सारे पंडे अय्यप्पा मंदिर की पवित्रता के लिए ज़िंदा दिखे ?.कहाँ गए हिन्दुस्तान की गली गली में फैले चिकनी चमड़ी के प्रचंड कथावाचक ......??????.कहा गया सवर्णों का उतंड ठेकेदार विशाल तिलकधारी देवकीनंदन ठाकुर .......................?
.....और इससे भी बड़ा मुद्दा कहाँ है इन पंडो के आगे पीछे घुमने वाले इनके प्रवचनों पर तालियाँ पीटने वाले वह करोडो भक्त ......................कहाँ मर गए ये सब ताली पीटक लहराते भक्त .जिन्हें लोकतंत्र में आम जनता मासूम जनता कहा जाता है ?
सबरीमाला को न समझ सकें तो यह आपके लिए एक आम मुद्दा है। सबरीमाला को समझेंगे तो आपको यह शतरंज की ऐसी बिसात की तरह नज़र आएगा जहाँ एक तरफ वे लोग हैं जो यह साबित कर देना चाहते हैं कि हमारे मजहब में रत्ती भर भी छेड़ करने का अंजाम तुम्हें भुगतना होगा और दूसरी तरफ एक ऐसा धर्म जिसने हर सहज, सुधारात्मक परिवर्तन को थोड़े-बहुत जद्दोजहद के बाद आत्मसात किया है, बशर्ते वह 'टू बी ऑर नॉट टू बी' जैसा प्रश्न न हो, बशर्ते उन परिवर्तनों में अस्तित्व की चुनौती न खड़ी की गई हो।
बाज़ी खेली जा रही है। 'द जेंडर इशू'- 'द वुमन'- 'द क्वीन।'
जिन लोगों की हिम्मत नहीं थी कि सदियों से बुर्के में कैद पड़ी मुस्लिम महिलाओं के हक की बात कर सकें, उनमें इतनी क्षमता अवश्य है कि वे बहुसंख्यक आस्था को तार-तार करते हुए उसके किसी मंदिर की किसी परंपरा को रौंद सकें। सिलसिलेवार ढंग से बहुसंख्यक परंपरा पर चुन-चुन कर प्रगतिशीलता का बुलडोजर चलाना उनकी फितरत है।
जिन लोगों में रंच मात्र भी क्षमता न थी कि वे ट्रिपल तलाक और हलाला की मार झेलती महिलाओं पर चूँ भी बोल सकें, उन्हें बहुसंख्यक धर्म के किसी एक विशेष मंदिर की किसी एक नियमावली में वह उर्वर मैदान दिखता है जिसमें पूरे कायनात की 'ब्रह्मानिकल पैट्रिआर्की' से मुक्ति की खेती लहलहाएगी।
जिन लोगों की इतनी हिम्मत नहीं होती कि वे बच्चा-फैक्ट्री बन चुकी महिलाओं की बदहाली पर, स्वास्थ्य समस्याओं की आड़ में ही सही, मुँह खोल सकें, वे पूछते हैं दस साल से पचास साल के बीच की लड़कियाँ किसी खास मंदिर क्यों नहीं जा सकतीं?
हर इस्लामिक समस्या को गुरबत, मज़लूमियत और गरीबी के नाम तले ढँक दिया जाता है। क्यों नहीं कोई प्रगतिशील बताता कि वह आख़िरी बार कब इन मजलूम, गरीब बस्तियों में जाकर पूरी हिम्मत से बोला कि अपनी औरतों को आज़ाद कर दो, याकि उन्हें बच्चा फैक्ट्री मत बनाओ? 'डोमिनेटिंग मेल शॉविनिज़्म' जब इन महिलाओं को केवल भोग-भोग कर उन्हें बच्चा जनने की मशीन बना कर रखता है, तब तुम्हारी छाती का ममतामयी दूध, जो हिन्दू धर्म के किसी एक मंदिर के किसी खास नियम को देख-देख कर उफान मारने लगता है, सूख क्यों जाता है?
जिन प्रगतिशीलों को लगता है कि ट्रिपल तलाक वैसा ही मुद्दा है जैसा बहुसंख्यक आस्था को कुचलते हुए जबरन सबरीमाला में घुसना उन लोगों से इतना ही कहना है कि अगर वाकई तुममें हिम्मत है, अगर वाकई तुम 'जेंडर न्यूट्रल सोसाइटी' (हास्यास्पद) बनाना चाहते हो तो उठाओ कदम और घुसो अन्य मजहबों के निषेधित पूजागृहों में।
लानी है 'जेंडर न्यूट्रेलिटी' तो ननों का स्कार्फ़ नोच कर फेंको, खींच कर उतार दो वह सलीब जो टंगा है गिरजाघर में। वह भी पुरुष का चलाया मजहब है। 'सेलिबेसी' की आड़ में वहाँ भी गोरखधंधे चलते हैं। ननों को वैश्यावृत्ति के लिए खुला प्रांगण दिया जाता है, जहां 'पास्टोरियल मेल शॉविनिस्ट टूल' तमाम 'सेलिबेसी ओथ' को भूल कर महिलाओं की योनियों में दुनियावी मज़ा ढूंढता है।
धर्मो रक्षति रक्षितः। धर्म के तंतु बहुत मजबूत होते हैं। ट्रेनों के 'आइल्स' में, खुले मैदानों में, सड़कों पर अव्यवस्था फैलाते नमाज़ियों का कोई कुछ नहीं बिगाड़ पाता, जानते हैं क्यों? क्योंकि उनके पीछे मजहब होता है, उनके रक्षार्थ खड़ा।
सबरीमाला हमें पुकार रहा है, हमें उसके साथ खड़ा होना होगा, प्राणपण से। समग्र हिन्दू चेतना अगर जाग्रत हो इसके पीछे खड़ी होती है तो न्यायालय को पुनर्विचार करना ही होगा। जानते हैं क्यों? क्योंकि तब धर्म हमारे पीछे खड़ा होगा।
'स्वामिये शरणम अय्यप्पा।'
"जय हिंद..!!"
Comments
Post a Comment