2019 एक और महाभारत

पुराने समय की बात है | महाभारत का युद्ध समाप्त हो चुका था, बुरी तरह घायल दुर्योधन तालाब के किनारे पड़ा था | बचे खुचे कुछ योद्धा उसके पास थे | पांडवों में जीत का उल्लास था, निराश कौरव पक्ष के वीर अफ़सोस करते थे | लेकिन बुरी तरह घायल दुर्योधन के प्राण नहीं निकल रहे थे, शायद कुछ सवाल उसके बाकि थे | दुर्योधन इतना घायल था की कुछ बोल नहीं पाता था | सिर्फ तीन उँगलियाँ उठा रखी थी, ये तो समझ में आता था की कोई तीन प्रश्न हैं उसके पास मगर कौन से प्रश्न ?

इतने में वहां श्री कृष्ण आये घायल दुर्योधन के पास पहुँच कर कहा, शांत दुर्योधन मैं तुम्हारे तीनों प्रश्नों का जवाब देता हूँ | पहला प्रश्न अगर तुम हस्तिनापुर के चारो ओर किला बनवाते, और किलेबंदी में रहकर ही युद्ध करते तो मैं सहदेव को आगे कर के युद्ध करता | सहदेव बहुत अच्छे घुड़सवार थे, कहा जाता है की वो बारिश की बूंदों के बीच से बिना भीगे अपना घोडा निकाल ले जाते थे | अतिशयोक्ति अलंकार है, मगर इतना समझ में आता है की वो बहुत तेज़ घुड़सवारों की कमान संभालते थे और उनके नेतृत्व में सेना बहुत तेज़ी से किले में घुस पाती |

श्री कृष्ण ने फिर कहा, अगर तुम विदुर को भी युद्ध में शामिल होने के लिए मना लेते तो मैं भी पांडवों की ओर से युद्ध में शामिल हो जाता | विदुर चतुर रणनीतिकार थे, नीतिशास्त्र में उनका लिखा / कहा भी काफी कुछ है | उनसे निपटने के लिए श्री कृष्ण ही उचित होते और दुर्योधन उनके शामिल होने पर भी हारता | ये समझते ही दुर्योधन ने दूसरी ऊँगली भी बंद कर ली | श्री कृष्ण ने आगे बताया, अगर तुम गुरु द्रोण के मरते ही अश्वत्थामा को सेनापति बनाते तो मैं किसी बहाने से युधिष्ठिर को गुस्सा दिला देता | अश्वत्थामा अनेक दिव्यास्त्रों का इस्तेमाल कर सकता था जो मनुष्यों के यद्ध में वर्जित थे मगर अश्वत्थामा उनका इस्तेमाल करता और वो पांडव सेना पर भारी पड़ते, युधिष्ठिर को वरदान था की वो अपने जिस शत्रु पर क्रोधित होते वो उनके सामने आते ही भस्म हो जाता |

दुर्योधन को समझ में आ गया की वो अगर रणनीति बदलता तो भी महाभारत का युद्ध जीत नहीं पाता | अपने सवालों के जवाब मिल जाने पर वो चैन से मर सका |

इधर राहुल गाँधी की वापसी दिख रही है, ये युवाओं को अपनी तरफ़ खींच कर कांग्रेस के सेक्युलर वोटों की किलेबंदी करना चाहेंगे | यहाँ बहुत तेज़ी से नए मुद्दे उठाने वाला और तेज़ मूवमेंट वाला कोई नेता चाहिए होगा, यहाँ अमित शाह बिलकुल फिट हैं | राहुल कोई जमीन से जुड़े नेता भी नहीं हैं उन्हें स्थापित करने के लिए वही तरीके इस्तेमाल होंगे जो राजीव और सोनिया को सामने लाने के लिए हुए थे | ऐसा करने वाले परदे के पीछे के पुराने रणनीतिकार कांग्रेस के पास होंगे, इनका मुकाबला करने के लिए वैसे ही दिमाग वाले भाजपा को भी चाहिए | Illuminati जैसी किसी विवेकानन्द फाउंडेशन का नाम सुना तो है, देखते हैं कौन आता है | आखरी है की मोदी हैं 65 के और राहुल 40 का | ऐसे में सेकंड लाइन ऑफ़ लीडरशिप भी चाहिए, देखें वो कहाँ से आती है !

दिन प्रतिदिन राजनीति रोचक होती जाती है ! दूर से बैठ के देखने में बाई गॉड की कसम बड़ा मज़ा आता है ! चुनाव होते रहने चाहिए ...

महाभारत की लड़ाई चल रही थी और युद्ध होते होते नौ दिन बीत गए थे | दसवें दिन की भी शुरुआत नहीं थी, दिन कुछ चढ़ चुका था | इस दिन कृष्ण पांडवों को ये समझा चुके थे कि भीष्म के रहते किसी भी तरह कौरवों से जीता नहीं जा सकता | आख़िरकार जब अर्जुन भीष्म से लड़ रहे थे उसी वक्त बीच में शिखंडी आ गए | शिखंडी को देखकर जैसे ही भीष्म ने धनुष नीचे किया वैसे ही अर्जुन ने उनपर कई तीर दाग दिए |

कहीं दूर महल में बैठे संजय अपनी दूर दृष्टि से ये सब देख रहे थे | भीष्म को शरसैय्या पर गिरता देखकर वो राजा धृतराष्ट्र को ये बुरी खबर देने चल पड़े | जब धृतराष्ट्र ने ये खबर सुनी तो एक बार तो उन्हें भीष्म के गिरने का यकीन ही नहीं हुआ ! तब युद्ध की पूरी घटनाओं के बारे में धृतराष्ट्र ने पूछा, धर्मक्षेत्रे कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सवः । मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥ यानि कि  धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! धर्मभूमि कुरुक्षेत्र में एकत्रित, युद्ध की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?

पूरी भगवतगीता में, धृतराष्ट्र का ये इकलौत श्लोक है, इसके अलावा संजय ने 40, अर्जुन ने 84 और श्री कृष्ण ने बाकि के 575 श्लोक कहे हैं | इस तरह भगवतगीता में कुल 700 श्लोक हैं |

कुछ ज्ञानियों को लग सकता है कि भगवतगीता युद्ध के पहले दिन शुरू हुई थी, दसवें दिन नहीं हुई थी | ऐसे लोग महाभारत दोबारा उठायें | भीष्म पर्व के अन्दर भगवत गीता पर्व नाम का उप पर्व है | वहां पच्चीसवें अध्याय पर भगवत गीता शुरू होती है और आगे बियालिसवें अध्याय में जाकर ख़त्म होती है | थोड़ा अजीब सा लग रहा होगा ये जानके कि गीता युद्ध के पहले दिन नहीं शुरू हो रही होती है | ऊपर से उच्चारण के साथ पढने पर भी ये करीब तीन घंटे में ख़त्म हो जाती है | अट्ठारह दिन नहीं लगते !

ये मामला बिलकुल वैसा ही है जैसे आप अपना लैपटॉप ठीक करवाने जाएँ और कोई आपसे कहे कि इसका RAM उड़ गया है | इसके रिपेयर में 2000 रुपये लगेंगे | अगर आपको नहीं पता कि RAM उड़ जाने पर, ज्यादातर वक्त स्क्रीन बिलकुल नीली दिखने लगती है तो आप मैकेनिक की बात मान लेंगे | आपकी जानकारी की ये कमी गिरोहों को आपको ठगने का मौका देती है | मिशनरी फण्ड पर पलती किराये की कलमें ही दोषी नहीं, दोष आपके अपने अज्ञान का भी है | आपने किताब को खोलकर पढ़ने के बदले, सिर्फ उसे लाल कपड़े में लपेट कर अगरबत्ती दिखाई है | जब घर में बच्चों ने उसे पढ़ने की कोशिश की तो आपको लगा कि साधू ना हो जाए ! छाती पीट पीट के आपने फ़ौरन मुहर्रम मानना भी शुरू कर दिया !

बाकी अपने धर्म के सबसे प्रमुख, सबसे आसानी से उपलब्ध, सबसे कम कीमत के ग्रन्थ के बारे में जब इतना भी नहीं पता था, तो आपका कट्टर हिन्दुत्ववादी शेर, चीते, बाघ, भेड़िये, या यूँ कहें कि लकड़बग्घे बनने का कितना हक़ है, वो तो समझ आ ही गया होगा ?

शायद ही महाभारत किसी ने पूरा पढ़ा हो, और जब ऐसे लोग मज़ाक उड़ाते हैं ये कहकर की “जो आपके धर्म ग्रंथों में नहीं वो तो हो ही नहीं सकता !” तो हंसी आ ही जाती है | दूसरी बात ये है की काव्यात्मक ग्रन्थ भी वैज्ञानिक ग्रंथों की तरह प्रतीकों पर आधारित होते हैं | एक छोटा सा अंतर ये है की वैज्ञानिक प्रतीक का एक ही अर्थ होता है, काव्य में अक्सर प्रतीक का एक से ज्यादा अर्थ होगा |

जब टीवी में महाभारत या रामायण जैसे सीरियल दिखाते हैं तो वो युद्ध पर समाप्त हो जाता है | लेकिन जब आप पढ़ने जायेंगे तो ये युद्ध महाभारत या रामायण का बहुत छोटा सा हिस्सा है | असली कहानी या तो उस से पहले है या फिर उसके बाद | अठारह पर्व होते हैं महाभारत में | महाभारत के युद्ध के बाद वनपर्व और अनुशाषण पर्व जैसे हिस्से हैं |

महाभारत में अर्जुन कहते हैं–

सूक्ष्मयोनीनि भूतानि तर्कगम्यानि कानिचित्।
पक्ष्मणोऽपि निपातेन येषां स्यात् स्कन्धपर्ययः।। महाभारत, शान्तिपर्व, 15.29

अर्थात्; 'इस जगत में ऐसे–ऐसे सूक्ष्म जन्तु हैं कि जिनका अस्तित्व यद्यपि नेत्रों से देख
नहीं पड़ता तथापि तर्क से सिद्ध है; ऐसे जन्तु इतने हैं कि यदि हम अपनी आँखों की पलक हिलाएं तो उतने से ही उन जन्तुओं का नाश हो जाता है।' ऐसी अवस्था में यदि हम मुख से कहते रहें कि 'हिंसा मत करो, हिंसा मत करो' तो उससे क्या लाभ होगा ?

“आप रूचि भोजन, पर रूचि श्रृंगार” मतलब जिसके लिए सज संवर रहे हों, कपड़े तो उसकी पसंद से पहन लेंगे हम, खाना मुझे अपनी मर्ज़ी का ही खाने दे महानुभाव |

ये पहले ही तय है कि हिन्दुओं के महाकाव्यों के लक्षण क्या होंगे | उसमें चारों पुरुषार्थों का जिक्र होना चाहिए | सिर्फ धर्म की बात नहीं होगी, सिर्फ़ मोक्ष का जिक्र नहीं होगा | वहां धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष चारों होंगे | इसलिए जब आप रामायण या महाभारत पढ़ रहे हैं, सुन रहे हैं और सिर्फ़ आह-वाह करके भावविभोर हो रहे हैं तो आपने आधा ही पढ़ा है | ये भी एक वजह है कि आपको ऐसे ग्रन्थ बार बार पढ़ने पड़ते हैं | अगर आप महाभारत का आखरी हिस्सा यानि स्वर्गारोहण वाला हिस्सा देखेंगे तो धर्म-मोक्ष से अलग एक ऐसा ही सवाल आपके मन में उठेगा |

यहाँ जब पांचो पांडव और द्रौपदी हस्तिनापुर छोड़कर निकलते हैं तो एक रेगिस्तान जैसे इलाके में से गुजर रहे होते हैं | यहाँ ना कोई पेड़ पौधा है ना कोई जीव जन्तु | एक एक कर के सभी गिरने लगते हैं और अकेले युधिष्ठिर ही आगे एक कुत्ते के साथ बढ़ते रह जाते हैं | सबसे पहले द्रौपदी गिरती है | उसके गिरने पर भी जब सभी आगे बढ़ते रहते हैं तो भीम पूछते हैं कि द्रौपदी क्यों गिरी ? युधिष्ठिर बताते हैं कि द्रौपदी पाँचों भाइयों में अर्जुन से ज्यादा प्रेम करती थी, बाकी सब से कम | इसलिए वो सबसे पहले गिरी |

द्रौपदी गिरी थी, मृत नहीं थी | युधिष्ठिर का जवाब उसने भी सुना होगा | सवाल है कि ये सुनने के बाद द्रौपदी ने क्या सोचा होगा ?

स्वयंवर में उसकी शर्तों को सिर्फ अर्जुन ने पूरा किया था | ऐसे में उसके मन में केवल अर्जुन के लिए ही भाव जागे थे तो गलत क्या था ? आगे जब स्वयंवर के बाद का महाभारत भी देखते हैं तो एक और चीज़ पर ध्यान जाएगा | एक प्रेमिका, एक पत्नी की तरह द्रौपदी को सिर्फ भीम स्थान देते हैं | कभी उसके पसंद के फूल लाने गए भीम राक्षसों और मुश्किलों का सामना कर के फूल लाते हैं | कभी जुए में द्रौपदी को दाँव पर लगाने वाले युधिष्ठिर पर चढ़ बैठते हैं | युधिष्ठिर को कह देते हैं कि ये पासे फेंकने वाले तुम्हारे हाथ जल क्यों नहीं जाते ? बड़ी मुश्किल से अर्जुन पकड़ कर सभा में, भीम को रोकते हैं |

महाभारत में द्रौपदी की स्थिति को पांच पतियों वाली विधवा जैसा दर्शाया गया है | पांच पतियों के होते हुए भी जुए वाली सभा में उसे बचाने उसके पति नहीं आये थे | सिर्फ भीम लड़ने को तैयार थे, जिन्हें बाकी भाइयों ने रोका | आगे वनवास में द्रौपदी पर नजर जमाये जयद्रथ को भी भीम का सामना करना पड़ता है | अज्ञातवास के दौरान जब कीचक की कुदृष्टि द्रौपदी पर थी तब भी उसे भीम ने ही मारा | कैसे देखें इसे, एकतरफा प्रेम जैसा ?

प्रश्न है कि प्रेम या विवाह किया कैसे जाना चाहिए ? जिसे आप पसंद करते हैं उस से, या जो आपको पसंद करता है उस से ? जैसे द्रौपदी को अर्जुन पसंद था वैसे, जैसे भीम को द्रौपदी पसंद थी वैसे, या फिर जैसे अर्जुन ने किया था ? उसने सुभद्रा से शादी की थी, जो उसका हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने उलूपी से शादी की थी वो भी अर्जुन का हरण कर के ले गई थी | अर्जुन ने चित्रांगदा से भी शादी की थी, जिसने उसे अपने घर में ही रख लिया था | संबंधों के मामले में अर्जुन शायद द्रौपदी से ज्यादा सुखी रहा |

हिन्दुओं के महाकाव्यों में प्रश्न अपने आप आते हैं | उत्तर आपको खुद भी पता है, किसी और से सुनने की जरूरत भी नहीं | ज्यादातर बार उत्तर, प्रश्न से पहले ही बता दिए गए होते हैं | बिलकुल आपके स्कूल की किताबों जैसा है | पहले चैप्टर ख़त्म होता है, फिर अंत में एक्सरसाइज और क्वेश्चन होते हैं | प्रश्नों के उत्तर पीछे के अध्याय में ही कहीं हैं, आपको पीछे जाकर ढूंढना होता है |

बाकी ये सूचना क्रांति का युग है | आपकी जानकारी जितनी ज्यादा है आप उतने ज्यादा शक्तिशाली होते हैं | ऐसे में अगर आपका विरोधी आपको किसी किताब की बुराई गिना रहा हो तो याद रखिये कि उसमें ऐसी कोई ना कोई जानकारी है जो आपको विरोधी से ज्यादा जानकार, ज्यादा शक्तिशाली बनाती होगी | आह-वाह करने के बदले ग्रन्थ उठा कर पढ़ लीजिये |

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