वैशाखनंदन
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डॉक्टर मनमोहन सिंह के पाप एक नहीं कई हैं। बेचारगी तो उनका एक गुण है जिसे सब लोग जानते हैं। जिन बातों पर ध्यान नहीं जाता उनमें से एक यह है कि डॉक्टर साहब जम्मू कश्मीर में जवाहरलाल और इंदिरा की नीतियों का अनुशरण कर रहे थे। यह संजय बारु की पुस्तक 'एक्सिडेंटल प्राइम मिनिस्टर' को 'in between the lines' पढ़ने पर समझ में आएगा। मनमोहन सिंह ने मई 2004 में एक विदेशी पत्रकार जोनाथन पॉवर को दिए अपने साक्षात्कार में ऑफ द रिकॉर्ड एक विचार प्रस्तुत किया था कि जम्मू कश्मीर में 'soft' या 'porous' सीमाएँ होनी चाहिये। अर्थात भारत पाकिस्तान के मध्य सीमाओं की बाधा नहीं होनी चाहिये। मनमोहन सिंह के इसी विचार को मुशर्रफ ले उड़ा और उसने प्रस्ताव दिया कि नियंत्रण रेखा के आसपास कुछ क्षेत्र चिन्हित कर दिए जाएँ, उनका विसैन्यीकरण कर दिया जाए और उन्हें संयुक्त राष्ट्र के अधीन कर दिया जाए। यह प्रस्ताव भारत पाकिस्तान दोनों तरफ से खारिज हो गया लेकिन मुझे यह नहीं समझ में आता कि डॉक्टर साहब के मस्तिष्क में इस प्रकार की बेहूदा बातें आती कहाँ से थीं।
इसी प्रकार 2005 में डॉक्टर साहब सियाचेन का विसैन्यीकरण (demilitarization) कर उसको माउंटेन ऑफ पीस बनाना चाहते थे। इसका खुलासा संजय बारु के अतिरिक्त श्याम सरन ने भी अपनी पुस्तक 'How India Sees the World' में किया है। गत वर्ष श्याम सरन के इस खुलासे पर विवाद हुआ था जिसके बाद पूर्व थलसेनाध्यक्ष जनरल जे जे सिंह को स्पष्टीकरण देना पड़ा था। बहरहाल, जनरल सिंह के तर्कों को फिलहाल किनारे रखकर देखा जाए तो सियाचेन के विसैन्यीकरण का निर्णय अकेले भारतीय सेना तो ले नहीं सकती थी। डांगडर साहब और उनकी रणनीतिक टीम इस प्रकार के आत्मघाती निर्णयों के वास्तविक स्टेकहोल्डर्स थे। कांग्रेस के नेता और मंत्री बाकायदा पाकिस्तान जाकर ट्रैक 2 डिप्लोमेसी करते थे ताकि नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा बना दिया जाए और पाक अधिकृत जम्मू कश्मीर पूर्ण रूप से पाकिस्तान को दे दिया जाए। जैसा कि ऊपर इंगित किया है इस प्रकार के प्रयास सन 1948 और 1972 शिमला समझौते से पहले भी किये गए थे। जवाहरलाल और इंदिरा दोनों ने नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा बनाने के प्रयास किये थे लेकिन पाकिस्तान को यह स्वीकार नहीं था क्योंकि प्रारंभ से ही पाकिस्तान की नीति स्पष्ट रही है कि उसे पूरा जम्मू कश्मीर राज्य चाहिए। इसके लिए पाकिस्तान ने पहले पारम्परिक युद्ध लड़े, फिर छद्म युद्ध (आतंकवाद) लड़ा और अब प्रोपगंडा वारफेयर पर उतारू है। यह जो कश्मीर में मानवाधिकार आदि की बातें होती हैं यह प्रोपगंडा युद्ध है जो पाकिस्तान लड़ रहा है। अरे भई, भरत कर्नाड ने तो यहाँ तक लिख दिया कि डांगडर साहब 2007 में यह कहते थे कि भारत को सुपरपॉवर बनने का विचार त्याग देना चाहिए। अर्थात सवा सौ करोड़ लोग जिनका हजारों वर्ष पुराना इतिहास है उस देश का प्रधानमंत्री यह कहता था कि हमको सुपरपॉवर बनने की कोई आकांक्षा नहीं है!
डांगडर साहब ये सब कारस्तानी किससे पूछकर करते थे? क्या आपने देश की जनता को सूचित करना आवश्यक नहीं समझा? आप ऐसे ही बिना करोड़ों लोगों का मत जाने नियंत्रण रेखा को स्थायी सीमा बनाने के प्रयास कैसे कर रहे थे? ब्रिटेन इतना छोटा देश है कि विश्व के मानचित्र पर साफ दिखाई तक नहीं देता। वहाँ जब स्कॉटलैंड के पृथक होने की बात उठी तो जनता ने निर्णय दिया कि हम अलग नहीं होंगे। भारत सवा सौ करोड़ लोगों का देश है, और यदि समूचे जम्मू कश्मीर राज्य की बात की जाए (including गिलगित बल्टिस्तान, केवल कश्मीर घाटी नहीं) तो वहाँ के लोग खुद पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बनना चाहते। डांगडर साहब ने जम्मू कश्मीर की भूमि पाकिस्तान को देने का विचार ऐसे ही कर लिया। बाह रे डांगडर साहब!
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