#मुझे_पढ़ोगे_तभी_बढ़ोगे
कभी कभी ऐड एजेंसियों के ऑब्जरवेशन पर दंग रह जाता हूं, कितना महीन पकड़ रखते हैं ये मनोविज्ञान पर!
एक ऐड स्लोगन आता था #टेढ़ा_है_पर_मेरा_है!
यह स्लोगन इस देश की मानसिकता में घुले क्षमाभाव का द्योतक है।
हमारी पीढ़ी गांव और शहर की आबोहवा में बराबर पली है।
हमने गांव में बचपन को पूरा जिया है और रोजी रोटी के लिए शहर को भी भोग रहे हैं।
राजनैतिक घटनाक्रमों में हम चार दशक के गवाह हैं।
एमरजेंसी के बाद के भारत को हम प्रतिपल बदलते देखते आए हैं।
आपातकाल के समय छुटभैय्ये रहे आज के सांसद विधायक हैं।
और आज के छुटभैय्ये हम हैं।
इंदिरा के अंतिम शासनकाल का गवाह भी हम हैं जब एमरजेंसी के बाद शानदार वापसी हुई थी और दो से दो सौ बिरासी तक पहुंचे भाजपा के भी।
आज की तकनीक संपन्न राजनीति का भी दर्शक हैं जिसमें कांग्रेस हांफते हांफते भी परिणाम अपने पक्ष कहीं कहीं कर ले रही है।
तीन राज्यों में भाजपा की हार पर बीते दिनों ब्राह्मण भूमिहार और राजपूतों के बड़े बूढ़ों को खुशी के मारे कसैली मुस्कान के साथ कहते सुना, बड़े आए थे एससी एसटी ऐक्ट लाने!
एससी एसटी ऐक्ट कांग्रेसी सरकार में भी थी लेकिन ऐसे मुद्दों पर कांग्रेस परिपक्वता दिखाने में सफल रहती है, वह मुस्लिम तुष्टिकरण हो या एट्रोसिटी एक्ट, इन पर खामोशी से काम करती रही है, जिससे कांग्रेस अपना हित भी साधती रही और किसी विशेष वर्ग को आंदोलित होने का मौका भी नहीं दिया।
ऐसे दृष्टिकोण पर कम्युनिस्टों की धूर्तता कांग्रेस का सहयोग करती आई है।।
अस्सी के दशक में वैसे ही एमरजेंसी को भूलकर पूरी तरह कांग्रेस के पक्ष में लोग आ गए थे जैसे तमाम भ्रष्टाचार और घोटाले के मामले को भूलकर 2018 में!
दोनों ही परिस्थिति में मेरा अवलोकन रहा कि अगड़ी जाति वालों में कांग्रेस की हार के बाद उसके प्रति सहानुभूति का भाव आ जाता है।
एक बात की दाद तो देनी होगी कि कांग्रेस के चिंतकों का भारतीय "मिजाज" पर गहरी पकड़ है।
वे जानते हैं कौन सा वर्ग क्या चाहता है।
सवा दो करोड़ सरकारी मुलाजिमों को कांग्रेस कभी नहीं छेड़ती है क्योंकि यह संख्या वोट के हिसाब से दस करोड़ तक हो जाती है।
यानि कुल वोटों का करीब करीब बारह प्रतिशत!
हालांकि 2014 में कांग्रेस के विरूद्ध जनाक्रोश वैसा ही फूटा जैसा 1978 में था, लेकिन 80 आते आते कांग्रेस के प्रति लोगों के मन में दया भाव पनपने लगा और परिणाम फिर इंदिरा के पक्ष में हो गया।
2004 में कांग्रेस पुन: "विक्टिमहुड" प्रसारित करने में सफल हो गई।
और 2019 आते आते भाजपा के सारे विकास कार्यों को धता बताते हुए फिर भारतीय मतदाता पर "स्टॉकहोम सिंड्रोम" हावी होने लगा है।
घूम फिर कर हम वही सोचने लगते हैं जैसा साठ वर्षों में कांग्रेस ने "सोशल सॉफ्टवेयर प्रोग्राम" किया है।
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