आदि शंकराचार्य ने 2500 वर्ष पहले भगवान जगन्नाथ जी के मंदिर में दो व्यवस्थाएं दी।
प्रथम, प्रभु का भोग रोज मिट्टी के नए पात्र में बनेगा, दूसरे, प्रभु का रथ यात्रा हर वर्ष नए रथ से होगी। ढाई हजार वर्ष पहले स्थापित इस परंपरा ने करोड़ो कुंभकार और काष्ठकार परिवार की जीविका सुरक्षित कर दी। आज भी है। दुनिया का कोई कारपोरेट, कोई हुकूमत, कोई मजहब, कोई आस्था, कोई रिलीजन, यह कार्य ना कर सका है और ना कर पाएगा।
यही ब्राह्मणवाद है। इसी ब्राह्मणवाद से पूंजीवाद, औपनिवेशिक, साम्राज्यवादी ताकतों को खुन्नस है।
बिहार कॉडर के सीनियर आईपीएस मित्र Arvind Pandey की एक पोस्ट पढ़ रहा था। जो मेरे इस विचार आरम्भ को व्यापक आधार दे रही है। हालांकि इस विषय पर कभी कोई संस्थागत शोध नहीं हुआ। पर मुझे लगता है होना चाहिए। तभी हिन्दू समाज,गिरोहबंद लंपटों का मुंहतोड़ जवाब दे पाएगा। नैतिक अपराधबोध से मुक्त हो सकेगा।
अब पढ़िए मित्र अरविंद जी की पोस्ट..और देखिए, समझिए अपने आसपास के समाज को। सत्य आपके सामने बिखरा हुआ है।
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#ब्राह्मण_प्रदत्त अर्थव्यवस्था : त्योहार और GDP :
... देश भर में वर्ष पर्यन्त ब्राह्मणों द्वारा प्रवर्तित 60 महत्वपूर्ण त्योहार मनाए जाते हैं... इन त्योहारों में लगभग 10 लाख करोड़ का व्यापार पूरे देश में होता है और वर्ष पर्यन्त इन त्योहारों की अर्थव्यवस्था से लगभग 10 करोड़ लोगों को रोज़गार मिलता है...
.... इसीतरह देश में छोटे बड़े मिलाकर कुल 5 लाख हिंदू मंदिर हैं जिनमें प्रत्येक मन्दिर से औसतन 1000 परिवारों का व्यवसाय चलता है और भरण पोषण होता है...!
..... इन त्योहारों और मंदिरों से जुड़े व्यवसायों से 90% लाभ कमज़ोर वर्गों के लोगों को ही मिलता है....
...... ब्राह्मण प्रणीत धर्म समाप्त हो जाय तो इन 25 करोड़ लोगों का भरण पोषण नेता और अधिकारी करेंगे क्या ??
.. शौचालय बनाइए मगर “देवालय से पहले शौचालय” जैसी विकास विरोधी बातें दिमाग़ से निकाल दीजिए !!
....... इसलिए देश की अर्थव्यवस्था को समृद्ध बनाने वाले और समाज के कमज़ोर वर्गों को वर्ष पर्यन्त रोज़गार दिलाने वाले #ब्रह्मवाद को प्रणाम करना भी सीखिए !!
... एते ब्रह्मवादिन: वदंति !!
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