अब फर्क नही पड़ता ...
जब कोई रिश्ता टूटता है या फिर जुड़ता हैं,
क्योंकि मुझे पता हैं कि वक्त की डोर जब ढ़ीली पडेगी तो वो रिश्ते मतलब की सिलाई से फिर से रफू कर लिये जायेंगें...
अब फर्क नही पड़ता ...
जब कोई बीच रास्ते मे साथ छोड़ देता हैं,
क्योंकि मुझे पता हैं कि हमसफर अलग हुआ है
मेरी राह और मंजिल तो नही बदली हैं और वहाँ अकेले ही पहुँचना हैं...
अब फर्क नही पड़ता..
जब कोई नाराज या गुस्सा होता हैं मुझसे या मैं उनसे...
क्योंकि दोनो सूरतो मे हालात मुझे ही सुधारने हैं..
अपने आप को ही मनमीत बनाना हैं ..
अब फर्क नही पड़ता...
कि कोई मुझे पत्थर कहेगा...
क्योंकि मुझे पता हैं इस जमाने मे पत्थर होना ,
इन्सान होने से ज्यादा अच्छा हैं ।
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