बंद आंख (काना राजा)

बंद आंख
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एक राजा था। उसकी एक आंख खराब थी।
जिनकी एक आंख खराब होती है, उन्हें कई लोग काना भी कहते हैं। पर मुझे काना शब्द अच्छा नहीं लगता।
मैं जानता हूं कि ये कहानी आपने भी सुनी होगी, लेकिन आज इस कहानी को सुनाने के पीछे मेरे मन में एक भाव है।
भाव ये कि दुनिया में चाहे लाख बुराइयां हों, आदमी चाहे तो उसमें भी अच्छाई देख सकता है।
अच्छा देखने के इसी भाव ने हमें उकसाया है कि काना को काना न कह कर इतना ही कहा जाए कि उनकी एक आंख खराब थी।

मेरी आज की कहानी में दो बातें स्पष्ट हैं। पहली बात तो ये कि कहानी एक आंख खराब वाले राजा की है और दूसरी बात ये कि ये कहानी आपकी सुनी हुई हो सकती है।

सुनी हुई है तो भी कोई बात नहीं। आज आप इसे हमारे स्टाइल में सुन लीजिए।

हां, तो बात यहां से शुरू हुई थी कि एक राजा था, जिसकी एक आंख खराब थी।
राजा का बहुत मन करता था कि कोई चित्रकार उसकी एक ऐसी तस्वीर बनाए, जिसमें वो खूबसूरत दिखे।
कई चित्रकार आए। राजा की कई तस्वीरें बनाई गईं। पर हर तस्वीर में राजा की एक आंख खराब नज़र आती और राजा उदास हो जाता।
राजा समझ गया था कि उसकी एक भी तस्वीर सुंदर नहीं बन सकती है। उसके इस संसार से चले जाने के बाद भी लोग उसे इसी रूप में याद करेंगे कि वो एक बदसूरत राजा था।
राजा की उदासी दिनों दिन बढ़ती जा रही थी। वो मन ही मन सोचता था कि इतने राजा इस देश में हुए, सभी की तस्वीरें हैं। लोग उन्हें याद रखेंगे। पर एक अभागा मैं, मुझे कोई नहीं याद रखेगा। कैसे रखेगा? मेरी एक भी तस्वीर नहीं होगी। और अगर किसी ने कभी याद किया भी तो मेरी एक आंख खराब है, उसी रूप में मुझे याद रखा जाएगा।
राजा बहुत दुखी था।
एक दिन राज दरबार में एक चित्रकार आया। उसने कहा कि वो राजा की ऐसी तस्वीर बना देगा, जिसे देख कर दुनिया वाह-वाह कर उठेगी।
राजा ने चित्रकार की बात सुनी तो हैरान रह  गया। ऐसा भला कैसे हो सकता है?
चित्रकार ने कहा कि हो सकता है। बिल्कुल हो सकता है। अगर आप मेरी निगाहों से दुनिया को देखेंगे तो कुछ भी हो सकता है। वो हर सुबह एक सुंदर कहानी लेकर आपके सामने आते हैं न? लोग सुबह-शाम अपनी और दूसरों की ज़िंदगी में सिर्फ नकारात्मक पहलुओं को ही ढूंढते हैं। लोगों की सुबह-शाम इसी चिंता में गुजरती है कि कि कैसे सामने वाले की बदसूरत तस्वीर दुनिया के सामने परोस दें। पर हम हर पल लोगों की सुंदर तस्वीरें उकेरने में लगे रहते हैं।

चित्रकार राजा से कह रहा था कि माना कि दुनिया में बहुत बुराई है, पर कहीं कुछ तो अच्छाई भी है। हमें स्याह नहीं, उजाला चाहिए।
राजा खुश हो गया।
उसने कहा, “चित्रकार अगर तुमने मेरी सुंदर तस्वीर बना दी, तो तुम जो चाहोगे तुम्हें मिल जाएगा।”
चित्रकार ने कहा, “राजन मुझे कुछ नहीं चाहिए। आप अवसाद से बाहर आ जाएं यही मेरा इनाम होगा। और हां, तस्वीर बनवाने के लिए आपको मेरे साथ कुछ दिन जंगल में चल कर रहना होगा। बस।”
“जंगल में? पर जंगल में क्यों?”
“सवाल नहीं राजन। बस चलिए मेरे साथ। हां, आप अपने साथ तीर-धनुष रख लीजिए। मैं आपकी सुंदर तस्वीर बनाऊंगा।”
राजा मान गया। वो चित्रकार के साथ तीर-धनुष लेकर जंगल चला गया।
चित्रकार ने राजा से कहा कि आप धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाईए। अपनी उस आंख को पूरी तरह बंद कीजिए, जो खराब है। और किसी आखेट पर निशाना लगाइए। मैं आपकी तस्वीर बनाऊंगा।
राजा कुछ समझा नहीं, पर उसने चित्रकार की बात मान ली।
कई दिनों तक ये क्रम चलता रहा। राजा एक आंख बंद कर तीर से निशाना लगा कर खड़ा हो जाता। चित्रकार उसकी तस्वीर बनता रहता।
आखिर में तस्वीर बन गई। चित्र में राजा एक बहादुर राजा नज़र आ रहा था। उसकी खराब आंख बंद थी और ऐसा लग रहा था कि वो उसे बंद कर निशाना साध रहा है।
राजा को तस्वीर बहुत पसंद आई। वो खुश हो गया। इतिहास की किताब में उसे बहादुर राजा के नाम से जाना जाने लगा।
बस इतनी-सी कहानी है।
कहानी का मर्म इतना ही है कि ये दुनिया बेशक बहुत खराब होगी, पर आप अपनी ज़िंदगी से बुराई के अवसाद को दूर करके अच्छाई को देखने की आदत डालिए। ज़िंदगी बहुत छोटी है। इसमें जितने पल सुकून और खुशी के निकल जाएं, वही बहुत है।
गांधी जी कहते थे, बुरा मत देखो, बुरा मत सुनो, बुरा मत कहो।
पर मैं कहता हूँ! अच्छा देखिए। अच्छा सुनिए। अच्छा कहिए।
अच्छाई को आत्मसात कीजिए।

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