अकेले हम - अकेले तुम
आज की परिपेक्ष्य में "अकेलापन दुनियां की सबसे खतरनाक बीमारी है "
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परसों नोएडा से खबर आई कि एक महिला की अपने फ्लैट में कई दिन पहले मृत्यु हो गई थी, पता कल चला।
पता भी चला लाश से उठने वाली दुर्गंध की वज़ह से। महिला काफी दिनों से अकेली रह रही थी। पति से वो अलग हो चुकी थी, एक बेटा था, जो पढ़ाई करने के बाद बंगलुरू में नौकरी कर रहा था।
कुछ दिन पहले ही महिला को किडनी की बीमारी हुई थी और वो अपना इलाज़ करा रही थी।
जो भी इस संसार में आया है, उसे एक न एक दिन जाना है। पर जब ख़बर मेरे पास आई तो मैं हैरान रह गया। बहुत देर तक सोचता रहा।
किसी की मृत्यु हो जाए और कई दिनों तक किसी को पता ही न चले, मतलब ये मौत बीमारी से कम अकेलेपन से अधिक हुई है।
मैंने कई बार लिखा है, कहा है कि अकेलापन से बढ़कर इस संसार में दूसरी कोई बीमारी नहीं।
लाश से उठने वाली बदबू की वज़ह से अगर लोगों को पता चले कि मुहल्ले में किसी की मौत हो गई तो यकीनन ये एक बड़ी बीमारी का संकेत है।
मतलब उस महिला के घर किसी का आना-जाना नहीं था। वो महिला किसी से नहीं मिलती-जुलती थी। ऐसे में पुलिस रिपोर्ट में ये मौत भले सहज मौत के रूप में दर्ज़ हो, पर असल में ये एक अहसज मौत है।
मुझे याद है तब मैं रसूलपुर स्कूल में पढता था मेरे दोस्त की मां जिन्हें मैं अपनी मां की तरह सम्मान देता था। जब वो बिमार पड़ी थी, डॉक्टरों ने उसे कैंसर बता दिया था, तब भी उन्होंने जीना नहीं छोड़ा था। वो जीती रही। आखिरी दिनों तक।
उनका शरीर बीमारी से कमज़ोर हो गया था, पर अपने आस-पास रिश्तों की खनक से उनके जीने की चाहत कभी खत्म नहीं हुई थी। मां की बीमारी के बाद मैंने देखा था कि उनके सभी रिश्तेदार उनसे मिलने आते थे। एक पल भी ऐसा नहीं आया, जब वो अकेली पड़ी हो।
मैं स्कूल से लौट कर यदाकदा उनके पास बैठता था। वो मुझे कहानियां सुनाती थी। वो मुझे जीवन के बारे में बताती थी।
मैं उनकी बीमारी के बारे में इधर-उधर से सुन कर आता था, उन्हें बताता था कि आप ठीक हो जाओगी।
वो कहती थी कि हां, ठीक हो जाऊंगी। वैसे भी मेरे पास इतने लोग हैं, इतने लोगों की दुआएं हैं, मैं ठीक हो जाऊंगी।
वो कैंसर को सबसे बड़ी बीमारी नहीं मानती थी, वो अकेलेपन को सबसे बड़ी बीमारी मानती थी। आप सोच रहे होंगे कि मैं इतनी निरस "अकेलेपन" पर कुछ लिख कर अपना समय क्यों बर्बाद किया? असल में पिछले कुछ वर्षों में अकेलापन छूत की बीमारी की तरह बढ़ा है। ये इत्तेफाक है कि कल ये खबर सामने आई और उससे एक दिन पहले मैं मेडिटेशन के एक कार्यक्रम में शामिल हो कर लौटा हूँ। असंख्य वरिष्ठ जनों से मुलाकात और वार्तालाप के बाद ये आभास हुआ कि 21वीं सदी का ये समाज अकेलेपन के दंश से गुजर रहा समाज है। एक मां, जिसने अपना पूरा जीवन अपने बच्चे को बड़ा करने, उसे पढ़ाने में लगा दिया, वो अपने जीवन की संध्या बेला में एक वृद्ध आश्रम में अकेली पड़ी है। उसके सामने बेटे की तस्वीर है और वो वृद्ध आश्रम के कर्मचारी से बार-बार अनुरोध करती है कि उसके बेटे को फोन किया जाए। बेटा फोन लाइन पर आता है, मां कहती है कि बेटा मुझे यहां से ले चलो। यहां मेरा जी घबराता है।
बेटा मां से कहता है कि उसके पास बिल्कुल समय नहीं। वो दिन भर ऑफिस के काम में व्यस्त रहता है। देर रात तक नौकरी करता है। ऐसे में उसे कैसे ले जाए?
वृद्ध आश्रम में काम करने वाले शुक्ला जी उस महिला को समझाते हैं कि अब आप बाकी के दिन इसी अकेलेपन के साथ जीने की आदत डाल लीजिए। बेटा अब कभी नहीं आएगा, आपको ले जाने के लिए। वो आएगा, पर उसी दिन आएगा, जब आप इस संसार से चली गई होंगी।
मां को यकीन नहीं होता कि ये सच है। वो बार-पार शुक्ला जी से बहस करती है कि उसका बेटा ऐसा नहीं। वो आएगा। उसे ले जाएगा।
खैर, मां की छाती में एक दिन दर्द उठता है। शुक्ला जी डॉक्टर बुलाने के लिए भागते हैं। मां हाथ में बेटे की तस्वीर लिए हुए, इस संसार से चली जाती है। जाते हुए तस्वीर देख कर दुआ देती है कि बेटा, तुम जहां भी रहो, खुश रहना।
मां अकेलेपन के दंश को सहते हुए इस संसार से चली जाती है। बेटा आता है। पर मां नहीं है।
वो रोता है। चीखता है। फिर चला जाता है।
अपने अकेलेपन के संसार में। एक ऐसे संसार में जहां वो रोज़ ऑफिस जाएगा, देर शाम तक काम करेगा। उसे लगेगा कि वो संसार का सबसे बेहतरीन काम कर रहा है। पर समय के साथ उसे पता चलेगा कि जिस संसार में वो मां को छोड़ कर चला गया था, कुछ वर्षों के बाद वही संसार उसका भी पीछा कर रही है।
हमारा मेडिकल साइंस न जाने कितनी बीमारियों का इलाज़ ढूंढ कर ला रहा है। पर किसी के पास अकेलेपन से निकलने की कोई दवा नहीं।
मान लीजिए, अकेलापन इस संसार की सबसे बड़ी और सबसे बुरी बीमारी है।
"ठाकुर की कलम से"
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