मन में श्रद्धा हैं तो निश्चिन्त रहिये आपका काम 'राम' बिगड़ने नहीं देंगे।

मन में श्रद्धा हैं तो निश्चिन्त रहिये आपका काम 'राम' बिगड़ने नहीं देंगे।

एक बार वृंदावन में एक सज्जन श्री मनोहर राज पुरोहित मिले,वृद्ध थे पर बेहद तेजस्वी व्यक्तित्व उन्ही ने एक सत्य घटना का ज़िक्र किया था जो आपके साथ बाँटता हूँ।

मथुरा के रहने वाले एक पंडित जी दिल्ली के एक मंदिर में पूजा किया करते थे,या फिर यूँ कहे की पूजा करने की नौकरी करते थे। पूजा की एवज में अच्छी सैलरी और चढ़ावे से दिन बड़े अच्छे कट रहे थे।परन्तू एक रोज मंदिर के मालिक मंदिर को पण्डित जी को सौंप हमेशा के विदेश चले गए।उन्होंने कहा कि पंडी जी जीवन के जाने कितने दिन शेष हैं, बेटा यहाँ आना नही चाहता इसलिये बची हुये दिनों में पोते-पोती को खिलाने की अभिलाषा हैं, इसलिये हम भी वही जा रहे हैं, अब रघुनाथ जी और ये मंदिर आपके हुये, आप जो उचित समझे करियेगा,हम शायद अब कभी ना लौटे।
दिन बीतते रहे,अन्य कोई आय बची नही और मंदिर के चढ़ावे से पंडित जी को घर खर्च चलाना भी मुश्किल हो गया।पत्नी कोई अन्य रोज़गार या नौकरी की कहती मगर पंडित जी राम जी को छोड़ नहीं पाये,फलस्वरूप दरिद्रता दिन बे दिन बढ़ती चली गई।
ठाकुर जी सेवा में मग्न पंडित जी को ना तो हाईटेक दुनिया की चकाचोंध विचलित करती थी ना ही कोई बाह्य आडम्बर।किसी तरह दिन कटते रहे,परन्तू मुश्किल तब आई जब बिटिया 20 वर्ष से ऊपर की हो गई मगर उसके विवाह के लिये घर में एक पैसा नहीं था,पत्नी के ताने सुनता तो कभी रिश्तेदारो के उलाहने।
मंदिर में बहुत कम लोग ही आते थे,सो पंडित जी बेहद दुःखी रहने लगे।बीमार रहने लगे।
एक रोज शाम आरती के बाद पंडित जी मंदिर की चौखट पर बैठे एक टक रामजी की मूर्ति को निहार रहे थे,नयन भीगे जैसे मन ही मन उन्हें उलाहना दे रहे हो। तभी एक वृद्ध जोड़ा मंदिर में आया।दोनों पत्नी पत्नी देखने से ही रईश लग रहे थे।
उन्होंने मंदिर में ढोक लगाई पूजा पाठ किया और फिर वही पंडित जी के सामने वाले चबूतरे पर बैठ गए।
पंडित जी अपनी ही दुनिया में खोये थे,उनकी राम राम की ध्वनि ने पंडित जी का ध्यान तोडा।
राम राम जी,वृद्ध औपचारिक वार्तालाप के बाद बोले,कुछ उदास लग रहे हैं पंडित जी,कोई तकलीफ़ हैं क्या ??
पंडित जी बोले दिन रात रामजी की छाया में रहता हूँ भला मुझे क्या तक़लीफ़ हो सकती हैं।
पंडित जी हमारे कोई संतान नही हैं,मेरी पत्नी कन्यादान करना चाहती हैं आपकी नज़र में कोई गरीब ब्राह्मण कन्या हो तो बताना,हम उसका विवाह करना चाहते हैं।
पंडित जी चौंक पड़े,अभी कुछ देर पूर्व ही तो वे इसकी शिकायत कर रहे थे राम जी से भला ये कैसा संयोग??
क्या ये महज इत्तेफ़ाक़ हैं या फिर कोई दैवीय शक्ति स्वयम उसके दुःखो का भंजन हेतु पधारी हैं??
उन्होंने अपनी बेचैनी छुपा कहा
आप चाहे तो मेरी पुत्री का विवाह कर सकते हैं,हम मथुरा के रहने वाले हैं।वृद्ध बोले ये तो और भी अच्छी बात हैं,
बुलाओ अपनी पुत्री को ज़रा।
पंडित जी ने बिटियाँ को आवाज दी,
माँ बेटी दोनों बगल वाले कमरे से बाहर आई,उन्होंने बिटियाँ को पास बुलाया उसके सर पे हाथ रखे स्नेहाशीष दिया और कहा कि अबसे तुम्हारी दो माँ हैं बिटिया।
बेटी के लिये सुयोग्य वर तलासने और उचित मुहूर्त निकालने की कह कर लौट गए।कुछ दिन बाद पंडित जी ने उन्हें मथुरा के ही एक लड़के को बताया और शादी तै हो गई।
शहर के सबसे महँगे मैरिज होल में बारात का स्वागत हुआ और उस दरिद्र ब्राह्मण की बेटी की ऐसी शादी हुई जो कई महीनो चर्चा का विषय रही।
सभी कार्य ख़त्म कर पंडित और पंडिताइन दोनों वापस दिल्ली मंदिर लौट आये।रोज़ शाम को पंडित और पंडिताईन रघुनाथ जी की देहरी पर मंदिर के गेट पर टकटकी लगाये देखते रहते हैं कि फिर उनके विघ्नहर्ता एक बार फिर उन्हें दर्शन दे।
ना जाने कितने वर्ष बीते मगर पंडित जी ने फिर कभी उन दोनों पति पत्नी को नहीं देखा।और ना ही उन्होंने देखा उस मुस्कान को जो अंदर जानकी और रघुनाथ जी की मूर्तियों के होठों पर निरंतर फ़ैल रही थी।

बोलो सियावर रामचंद्र की जय।

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