"प्रारब्ध" कर्म का फल

बचपन में हिंदी फिल्में देखते हए जब नकली दवा बनाने वाले किसी सेठ के बच्चे को अपने ही पिता की कंपनी की दवा खाकर मरते हुए मैं देखता था तो सिहर उठता था। फिल्म की कहानी चाहे जो हो, मेरे ज़ेहन में बस एक ही बात घूमती थी। आदमी जो करता है, उसे एक दिन भुगतता है।
सेठ जी, करोड़ों रुपए कमा चुके होते थे। सारे शहर में उनके रुतबे का सिक्का चलता था, पर एक दिन जब वो घर पर नहीं होते, उनकी पत्नी पास वाली दुकान से दवा मंगवाकर अपने बीमार बेटे को खिलाती और फिर सेठ-सेठानी का पूरा जीवन रो-रो कर गुज़रता।
सेठ जी माथा पीटते। “हे भगवान! ये कैसा अन्याय तूने मेरे साथ कर दिया?”
शुरू में तो मुझे सेठ जी से हमदर्दी होती कि उनके साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था। फिर सोचता कि सेठ जी ने दौलत कमाने के लिए अपने ज़मीर से समझौता किया ही क्यों था? मैंने अपनी दीदी के साथ कई फिल्में देखी हैं। नाम याद नहीं, पर सेठ की नकली दवा और उनके बेटे की मौत वाली फिल्म को देख कर मैंने दीदी से पूछा था कि कितना बुरा हुआ न?
दीदी ने मुझे कहा था, “हां, बुरा हुआ। पर लोग जो करते हैं, उसे भुगतना भी पड़ता है।”

शुरू में मेरे मन में दो सवाल उठते थे। पहला ये कि उस बच्चे का क्या कसूर था, जिसने अपने पापा की कंपनी की दवा खाई?
दूसरा ये कि कोई बहुत पैसे कमा कर करेगा क्या?

जैसे-जैसे बड़ा होता गया, मेरे दोनों सवालों के जवाब मुझे मिलते चले गए। कई बार, कई उदाहरणों के साथ।

दीदी ने कहा था कि लोग जो करते हैं, उसे भुगतना पड़ता है।
मैंने लोगों को भुगतते हुए देखा है। मैंने करीब-करीब हर गलत काम की सज़ा पाते हुए लोगों को देखा है। सच कहूं तो पूरा संसार ही, सही और गलत के फलसफे पर टिका है।

अगर कृष्ण ने इस संसार को कर्म प्रधान माना है तो ये भी कहा है कि कर्म का फल उसकी चाहत पर नहीं।
कर्म के फल पर कर्ता का नियंत्रण नहीं। फिर किस पर है?

कृष्ण कहते हैं वो ईश्वर पर है। मेरे मन में ये सवाल भी उठे कि ईश्वर कौन है?

फिर समझ में आया कि वो जो भी है, फिलहाल हमारे सामने सिर्फ कर्म की गुणवत्ता के रूप में खड़ा है। मतलब गलत करेंगे, गलत होगा। सही करेंगे, सही होगा।
अगला सवाल- बहुत से पैसों का आदमी करेगा क्या?

आदमी कुछ नहीं कर सकता। वो चोरी से, धोखे से चाहे जितने पैसे कमा ले. पर जिस दिन यहां से जाएगा, अपने साथ एक दमड़ी भी नहीं ले जा सकता है।
फिर वो ऐसी गलती करता ही क्यों है?

वो ऐसी गलती करता है, अपने हिस्से की सज़ा भुगतने के लिए।
आज इतनी गूढ़ बात को कुरेदने का कोई फायदा नहीं। आज तो मैं सिर्फ एक खबर को पढ़ कर आप तक पहुंचा हूं।

पिछले दिनों उत्तर प्रदेश के मुख्य मंत्री आदित्यनाथ योगी जी ने शिक्षकों से कहा कि आप खुद जहां पढ़ते हैं, अपने बच्चों को भी वहीं पढ़ाएं।
उन्होंने कई बातों के बीच ये बात भी कही थी।
आपको तो पता है कि ऐसी बातें हों तो मेरे लिए उसे कहानी में ढालना ज्यादा आसान हो जाता  हैं, जहां कहानी का ‘क’ भी न हो।

योगी जी ने ये बात कही और मुझे मेरी दीदी की बात याद आ गई।
“मैं कहती थी न भाई, लोग जो करते हैं, उसे भुगतना भी पड़ता है।

आज अगर सरकार ये नियम बना दे कि सभी शिक्षकों और सरकारी कर्मचारियों और अफसरों के बच्चे सिर्फ सरकारी स्कूल में ही पढ़ेंगे तो आने वाले समय में नकली दवा की सारी फैक्ट्रियां बंद हो जाएंगी।

मुझे नहीं पता कि योगी जी ने जो कहा है, उस पर कितना अमल होगा। पर दीदी ने कहा था कि सज़ा भुगतनी ही पड़ती है तो मुझे लग रहा है कि देर-सबेर ये होकर रहेगा।

मुझे अफसोस तो बहुत होगा, जब सेठों के बच्चे अपने पापा के किए का फल पाएंगे।
पर क्या करें। प्रारब्ध भी कोई चीज़ तो है ही।

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