जब लाल किले पर भगवा ध्वज लहराया

जब लाल किले पर भगवा ध्वज लहराया

इस ऐतिहासिक तथ्य को देश के कितने लोग जानते हैं कि वीर मराठाओं ने अटक से कटक तक भारत भूमि को मुगलों के चुंगल से मुक्त करवा लिया था और दिल्ली के लाल किले पर हिन्दू पद-पादशाही का प्रतीक भगवा ध्वज पूरे गौरव से लहराने लगा था

खेद की बात है कि अंग्रेज और वामपंथी इतिहासकारों ने हिन्दू इतिहास के अनेक स्वर्णमय अध्यायों को देश की जनता से जानबूझकर छुपाए रखा। इन इतिहासकारों ने हिन्दू जाति की एक गलत तस्वीर देशवासियों के सामने पेश की और उन्होंने यह आभास दिलाने का प्रयास किया कि जो भी विदेशी आक्रमणकारी आया, हिन्दुओं ने उसी के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। हालांकि यह सरासर गलत है।

मराठा वीरों की गौरव गाथाएं हरि कथा की तरह अनन्त हैं मगर देश की अधिकांश जनता उनके बारे में पूर्णतः अनभिज्ञ है। देश से मुगल साम्राज्य की कमर तोड़ने वाला अभूतपूर्व योद्धा रघुनाथ रघुवा था। जिसने अटक से कटक तक पूरे क्षेत्र को विधर्मियों के चुंगल से मुक्त करवा लिया था। उसका सामना करने की किसी भी विधर्मी शासक में हिम्मत नहीं थी। इस महान योद्धा ने अपने जीवन में 95 युद्ध लड़े और हर युद्ध में विजय प्राप्त की। मराठाओं के इस गौरव का जन्म पेशवा बाजीराव के परिवार में हुआ था। सबसे पहले 1751 में मराठा सेना ने बिहार और उड़ीसा पर हमला किया था। बंगाल के नवाब अली वर्दी खान को मुंह की खानी पड़ी और उसे मराठाओं के साथ ही संधि में उड़ीसा प्रदेश को उनके हवाले करना पड़ा। इस वीर ने हिन्दुओं के कई दर्जन पावन तीर्थों का पुनर्निर्माण करवाया जिन्हें विधर्मियों ने ध्वस्त कर दिया था।

मराठाओं की बढ़ती हुई शक्तियों के कारण देश के मुस्लिम शासक बेहद परेशान थे। उन्होंने दिल्ली के कुख्यात् वहाबी अब्दुल हक मुस्सक देहलवी को इस बात के लिए उकसाया कि वह अफगानिस्तान के शासक अहमद शाह अब्दाली को भारत पर हमला करने के लिए उकसाए। ताकि मराठाओं की हिन्दू पद-पादशाही का स्वप्न धूल में मिल जाए और उसके स्थान पर भारत में पुनः इस्लामी राज की स्थापना हो। इस वहाबी का मकबरा आज भी दिल्ली में पंडित पन्त अस्पताल के पीछे स्थित है। अब्दाली को देश पर हमला करने की दावत देने वालों में नवाब नजीबुदौला भी शामिल था। अब्दाली ने हमला करके दिल्ली पर कब्जा कर लिया। उन दिनों ब्रज में होली का त्यौहार मनाया जा रहा था। विधर्मियों ने होली का त्यौहार मनाने वाले हजारों श्रद्धालुओं की हत्या कर दी। सिख इतिहासकार डाॅ. गोपाल सिंह के अनुसार अब्दाली हिन्दू मंदिरों और भारत के अनेक भागों से लुटी हुई दौलत को 200 ऊंटों पर लादकर अफगानिस्तान अपने साथ ले गया। मथुरा पर हमले की सूचना मिलते ही मराठाओं का खून खौल उठा। ग्वालियर से दत्ताजी सिंधिया, मलहारराव होल्कर अपनी सेनाओं को लेकर रघुनाथ रघवा के नेतृत्व में दिल्ली की ओर बढ़े। मराठाओं के भारी लश्कर को आते हुए देख अफगानी दुम-दबाकर भाग गए। मराठा वीर विजय पताका फहराते हुए दिल्ली की ओर बढ़े। मुगल सम्राट के वज़ीर गियाजुद्दीन ने यमुना के किनारे बुराड़ी में मराठाओं का सामना करने का प्रयास किया। मगर मुंह की खाई। मराठा सेना रघुनाथ रघवा के नेतृत्व में विजय मार्च करते हुए लाल किले में दाखिल हो गई और वहां भगवा ध्वज लहरा दिया गया। मुगल सम्राट अहमद शाह अब मराठाओं का कैदी था। मराठाओं ने उसके स्थान पर एक अन्य मुगल शहजादे को जेल से निकालकर दिल्ली की गद्दी पर बिठा दिया और उसे आल्मगिर द्वितीय का नाम दिया गया।

मराठा वीर विजय पताका फहराते हुए पंजाब की ओर बढ़े। अफगान सेना सिर पर पैर रखकर भागी। विजयी मराठा सेना का साथ पंजाब के सिखों ने दिया। इन सिख सैनिकों का नेतृत्व जस्सा सिंह अहलूवालिया और बाबा आला सिंह कर रहे थे। मराठाओं और सिखों की संयुक्त सेना ने सरहिन्द पर अधिकार कर लिया। सरहिन्द के नवाब को भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। इसके बाद इस संयुक्त सेना ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर को विधर्मियों के कब्जे से मुक्त करवाया। इसे अब्दाली ने ध्वस्त कर दिया था। रघुवा ने इसका पुनः निर्माण करवाया। अमृतसर पर खालसा पंथ का पीला ध्वज फिर से लहराने लगा।

विजयी सेना लाहौर की ओर बढ़ी। 10 अप्रैल, 1758 को उन्होंने लाहौर पर अधिकार कर लिया। मराठाओं ने 75 लाख रुपए नज़राना लेकर अदीना बेग को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया। कहा जाता है कि अदीना बेग की नियुक्ति को लेकर मराठाओं और सिखों में गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गए थे जो बाद में बहुत ही खतरनाक साबित हुए। रघुवा की विजयी सेना पेशावर की ओर बढ़ी। इस सेना में पेशवा के मुस्लिम पुत्र शमशेर बहादुर गंगा तारतातिया, सखाराम बापू, नारू शंकर, दत्ताजी सिंधिया आदि अनेक मराठा सेनापति शामिल थे। अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह ने लाहौर से भागकर पेशावर में शरण ली हुई थी। उसके साथ उसका वज़ीर जहां खान भी था। इन्होंने एक लाख मुस्लिम सैनिक इकट्ठे कर रखे थे। मगर वह मराठा वीरों का सामना नहीं कर सके। रघुनाथ रघवा ने पचास हजार मराठा सैनिकों के साथ पेशावर पर हमला किया। आठ सौ वर्ष की गुलामी के बाद पहली बार पहली बार पेशावर विधर्मियों की गुलामी से मुक्त हो गया और उस पर हिन्दू पद-पादशाही का भगवा ध्वज लहराने लगा। मराठा सेनापति तुक्कोजी होल्कर, नरसूजी पंडित, बापूजी त्रिम्बक, निक्काजी भोंसले आदि ने पूरे क्षेत्र को विधर्मियों की गुलामी से मुक्त करवा लिया। हिन्दू इतिहासकार भाई परमानन्द जी ने हिन्दुओं की इस यशोगाथा का विस्तृत वर्णन अपनी कालजयी कृति महाराष्ट्र की तारीख में विस्तृत रूप से किया है। अफगान सैनिकों को भागकर गंधार में शरण लेनी पड़ी। भाईजी ने लिखा है कि पेशावर पर महमूद गज़नवी के पिता सुल्तान सबुतगीन ने आठ सौ वर्ष पूर्व कब्जा किया था। शाही वंश के अंतिम महाराजा राजपाल ने युद्ध में पराजित होने के बाद आत्मदाह कर लिया था। 28 अप्रैल, 1758 को मराठाओं की विजयी सेना अटक की ओर बढ़ी। इस सेना का नेतृत्व रघुनाथ रघवा और तिक्कोजीराव होल्कर कर रहे थे। अटक के किलादार वजीरुल्ला खां और करीम शाह ने मराठा लश्कर का मुकाबला करने का प्रयास किया। मगर मुंह की खाई। दोनों युद्ध में मारे गए। मराठाओं ने दस हजार अफगान सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। एक हजार वर्ष की विदेशी गुलामी से अटक से कटक तक का क्षेत्र मुक्त हो गया। रघुवा ने 4 मई, 1758 को पेशवा श्रीमन्त को एक पत्र भेजकर यह शुभ सूचना दी कि लाहौर, मुल्तान, दिल्ली, पेशावर और अटक पर हिन्दू पद-पादशाही का कब्जा हो गया है। रघुवा ने पेशवा श्रीमन्त को बताया कि हमारा अगला निशाना समूचे अफगानिस्तान को विधर्मियों के चुंगल से मुक्त करवाना है और शीघ्र ही यह क्षेत्र हिन्दू पद-पादशाही में शामिल कर लिया जाएगा। काबुल पर भी भगवा ध्वज लहराने लगेगा।
मराठा वीर विजय पताका फहराते हुए पंजाब की ओर बढ़े। अफगान सेना सिर पर पैर रखकर भागी। विजयी मराठा सेना का साथ पंजाब के सिखों ने दिया। इन सिख सैनिकों का नेतृत्व जस्सा सिंह अहलूवालिया और बाबा आला सिंह कर रहे थे। मराठाओं और सिखों की संयुक्त सेना ने सरहिन्द पर अधिकार कर लिया। सरहिन्द के नवाब को भागकर अपनी जान बचानी पड़ी। इसके बाद इस संयुक्त सेना ने अमृतसर स्थित स्वर्ण मंदिर को विधर्मियों के कब्जे से मुक्त करवाया। इसे अब्दाली ने ध्वस्त कर दिया था। रघुवा ने इसका पुनः निर्माण करवाया। अमृतसर पर खालसा पंथ का पीला ध्वज फिर से लहराने लगा।

विजयी सेना लाहौर की ओर बढ़ी। 10 अप्रैल, 1758 को उन्होंने लाहौर पर अधिकार कर लिया। मराठाओं ने 75 लाख रुपए नज़राना लेकर अदीना बेग को पंजाब का राज्यपाल नियुक्त किया। कहा जाता है कि अदीना बेग की नियुक्ति को लेकर मराठाओं और सिखों में गम्भीर मतभेद उत्पन्न हो गए थे जो बाद में बहुत ही खतरनाक साबित हुए। रघुवा की विजयी सेना पेशावर की ओर बढ़ी। इस सेना में पेशवा के मुस्लिम पुत्र शमशेर बहादुर गंगा तारतातिया, सखाराम बापू, नारू शंकर, दत्ताजी सिंधिया आदि अनेक मराठा सेनापति शामिल थे। अहमद शाह अब्दाली के बेटे तैमूर शाह ने लाहौर से भागकर पेशावर में शरण ली हुई थी। उसके साथ उसका वज़ीर जहां खान भी था। इन्होंने एक लाख मुस्लिम सैनिक इकट्ठे कर रखे थे। मगर वह मराठा वीरों का सामना नहीं कर सके। रघुनाथ रघवा ने पचास हजार मराठा सैनिकों के साथ पेशावर पर हमला किया। आठ सौ वर्ष की गुलामी के बाद पहली बार पहली बार पेशावर विधर्मियों की गुलामी से मुक्त हो गया और उस पर हिन्दू पद-पादशाही का भगवा ध्वज लहराने लगा। मराठा सेनापति तुक्कोजी होल्कर, नरसूजी पंडित, बापूजी त्रिम्बक, निक्काजी भोंसले आदि ने पूरे क्षेत्र को विधर्मियों की गुलामी से मुक्त करवा लिया।

हिन्दू इतिहासकार भाई परमानन्द जी ने हिन्दुओं की इस यशोगाथा का विस्तृत वर्णन अपनी कालजयी कृति महाराष्ट्र की तारीख में विस्तृत रूप से किया है। अफगान सैनिकों को भागकर गंधार में शरण लेनी पड़ी। भाईजी ने लिखा है कि पेशावर पर महमूद गज़नवी के पिता सुल्तान सबुतगीन ने आठ सौ वर्ष पूर्व कब्जा किया था। शाही वंश के अंतिम महाराजा राजपाल ने युद्ध में पराजित होने के बाद आत्मदाह कर लिया था। 28 अप्रैल, 1758 को मराठाओं की विजयी सेना अटक की ओर बढ़ी। इस सेना का नेतृत्व रघुनाथ रघवा और तिक्कोजीराव होल्कर कर रहे थे। अटक के किलादार वजीरुल्ला खां और करीम शाह ने मराठा लश्कर का मुकाबला करने का प्रयास किया। मगर मुंह की खाई। दोनों युद्ध में मारे गए। मराठाओं ने दस हजार अफगान सैनिकों को युद्धबंदी बना लिया। एक हजार वर्ष की विदेशी गुलामी से अटक से कटक तक का क्षेत्र मुक्त हो गया। रघुवा ने 4 मई, 1758 को पेशवा श्रीमन्त को एक पत्र भेजकर यह शुभ सूचना दी कि लाहौर, मुल्तान, दिल्ली, पेशावर और अटक पर हिन्दू पद-पादशाही का कब्जा हो गया है। रघुवा ने पेशवा श्रीमन्त को बताया कि हमारा अगला निशाना समूचे अफगानिस्तान को विधर्मियों के चुंगल से मुक्त करवाना है और शीघ्र ही यह क्षेत्र हिन्दू पद-पादशाही में शामिल कर लिया जाएगा। काबुल पर भी भगवा ध्वज लहराने लगेगा।

इसे देश का दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि पेशवा श्रीमन्त के पूना दरबार में रघुवा के शत्रुओं को रघुवा का यह विजय अभियान आंखों में कांटों की भांति चुभ रहा था। उन्होंने पेशवा की एक पत्नी को रघुवा के खिलाफ भड़काया। इस महिला ने पेशवा श्रीमन्त के कान भरे और पेशवा ने एक फरमान जारी करके रघुवा को वापस पुणे लौट आने का निर्देश जारी कर दिया। यह सबसे बड़ी भूल थी। रघुवा के उत्तर भारत से हटते की अफगानों ने पुनः भारत पर हमलों का सिलसिला तेज कर दिया और एक वर्ष के भीतर ही अटक, पेशावर और लाहौर मराठाओं के हाथों से निकल गया। काबुल पर भगवा ध्वज लहराने का स्वप्न सदा के लिए चूर-चूर हो गया

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