"जनेऊधारी ब्राह्मण की कैलाश यात्रा"

"जरा हट के"
"जनेऊधारी ब्राह्मण की कैलाश यात्रा"

कैलाश पर नियत गति से जीवन चल रहा था । आदियोगि समाधिस्थ थे , माता प्रभु के समाधि त्याग कर सांसारिक अवस्था में आने की प्रतीक्षारत उनके निकट ही कैलाश की समस्याओं के निवारण में व्यस्त थीं । गजानन वेद आदि समस्त ज्ञान की पुस्तकें ग्यारह  करोड़ बाईस लाख पांच हजार इक्कीसवीं बार रिवाइज़ करके नए एडिशन के पब्लिकेशन के लिए पब्लिशर गीता प्रेस गोरखपुर के साथ मीटिंग कर रहे थे । नंदी श्रृंगी , भृंगी आदि गण अपने अपने कार्यों में व्यस्त थे । वैसे तो भाद्र मास के अनुसार इस भाग में शीतलहर प्रारंभ होती है परंतु आज वातावरण गर्म था। इस सबके बीच एक गण हांफता दौड़ता माता के पास आया और कहा , माते , कोई भक्त प्रभु के दर्शन की आस लिए मृत्यु लोक से छियालीस हजार पग नापता हुआ यहां तक आ पहुंचा है । पूछने पर बताया .....
कलियुग का इकलौता ब्राह्मण भक्त नहीं हूं आंधी हूं।
फिटबिट बांधे कदम बढ़ाता सुन लो राहुल गांधी हूं।।

माता आश्चर्य से सोच ही रहीं थीं की कलयुग में ऐसा अविनाशी भक्त कौन हुआ है , कि तब तक प्रभु ने समाधि का त्याग कर आंखें खोल दीं....

समस्त कैलाश दीप ज्योति से प्रकाशित सा हो गया । शांत चित्त प्रभु को मुस्कुराते देखकर माता ने प्रणाम कर समाधि त्यागने का कारण पूछा तो प्रभु और मुस्कुराए और बोले कि "आज त्रेता के बाद कोई परमज्ञानी ब्राह्मण अखंड तपस्या के बाद मेरे दर्शन  की लालसा लिए कैलाश तक आ पहुंचा है इसीलिए मैं प्रसन्न हूं देवी" पीछे नंदी जो अब तक हाथ बांधे खड़े थे नथुने फुलाते हुए फुंफकारने लगे , प्रभू का मुझसे बड़ा कोई भक्त , ये अप्रेज़ल के लिए अच्छे संकेत नहीं थे , पर समय की आवश्यकता जान कर चुप रह गए।

तब तक प्रचंड वेग से बर्फ की आंधी चलने लगी , चारों ओर अंधकार हो गया , वृष्टि होने लगी , कोलाहल सा प्रतीत होने लगा , सबने कौतूहल से देखा देवाधिदेव अब भी शांत थे । रावण ने कैलाश को उठाने की चेष्टा की थी और प्रभु ने कैसे पैर के अंगूठे से उसके दंभ को धराशायी किया था ये कहानी याद दिलाई तो नंदी मुंह बिचकाते हुए बोले भगवन आज भी तांडव स्तोत्र जैसा कोई महाकाव्य गढ़ा जाएगा क्या ...

शिव शंभु फिर हंसे और बोले भक्तराज के स्वागत के लिए जाओ और उनके आने पर बस इतना पूछना कि शिव का धनुष जनक की सभा में किसने तोड़ा ...

आदेशानुसार नंदी महाराज ने वही किया , और पूछा " हे मनुष्य में श्रेष्ठ बताओ जनक की सभा में शिव का धनुष किसने तोड़ा " इसके बाद ही कैलाश पर आ पाओगे , परम शिव भक्त पहले तो सकुचाए , फिर सोचने लगे , मामला सीरियस था गाल पर डिंपल पड़ने लगे थे , तो मुस्कुराते हुए बोले "आई डोन्ट नो दिस काइंड ऑफ स्टफ, सो आई विल नॉट बी एबल टू आंसर दिस क्वेसचन, आई डोन्ट हैव द डीटेल्स" पर नंदी अड़े रहे जवाब दो , ये अली बाबा की कहानी का सा मोड़ था , गुफा खुल नहीं रही थी , सिमसिम याद नहीं था , तो " ट्रंप कार्ड " खेला कि " ये सवाल आप मोदी जी से पूछिए न" नंदी ने मत्था पीटा और हंसते कूदते वापस आकर पूरा किस्सा कैलाश पर बताया , ठहाकों कि हंसी के साथ पूरा कैलाश हास्योत्सव में डूब गया , आंधी जी सॉरी गांधी जी को लगा एंट्री मिल गई , थोड़ी फोटो खिंची की प्रूफ मिल जाए पर जियो का नेटवर्क था नहीं तो दिल्ली वॉट्सऐप नहीं कर पाए , प्रभु ने नंदी को वापस भेजा और कहा कि फिटबिट रिसेट करके भक्तराज को अलविदा कह दो और कैप्शन में बता देना की शिव तक पहुंचने का रास्ता आज भी श्री राम के नाम से होकर ही आता है ।

मंदिर मंदिर चीख कर ब्राह्मण भया न कोय।
छियालीस हजारी मानसरोवर चढ़े सो ब्राह्मण होय।।
ब्राह्मण डीएनए है भाई ....

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