देखिये जनाब ऐसा है कि एक परिवार है, जिसने बहुत कुर्बानियां (?) दी हैं.. मुगलों के वंशज थे लेकिन धीरे से कब हिन्दू बन गए किसी को कानोंकान खबर नहीं हुई.. इनमें से एक चिचा निकले.. नाम के आगे पंडित लगा लिया.. अब ये और इनके बुज़ुर्ग साथी वो चरखा चलाया करते थे.. अंग्रेज़ केवल इन दोनों से ही घबराते (?) थे.. बड़े बड़े स्वतंत्रता सेनानियों को जेलों में ठूँसकर रखते थे.. फाँसी, काले पानी की सज़ा देते थे, कोड़े मारते थे, जलियांवाला बाग में एक ही बार में हज़ारों लोग मार दिए.. लेकिन इनसे बहुत घबराते थे.. आज़ाद, भगतसिंह, खुदीराम बोस जैसे जानें कितने ही वीरों की हत्या कर दी, फाँसी दे दी.. लेकिन इन दोनों से बहुत घबराते थे..क्योंकि बाबाजी चरखा चलाते और अंग्रेज़ घबरा जाते.. उधर चिचा ने अलग ही काम कर रखा था.. वो तो अंग्रेजन को ही पटा लेते.. उनके साथ रंगरेलियां मनाते, इससे अंग्रेजों की हालत ख़राब हो गई.. उनको लगा कि इस तरह तो चिचा किसी को नहीं छोड़ेगा.. उधर चरखे वाले भी कम न थे.. वो भी बहुत प्रयोग करते रहते थे.. इसकी भी ख़बर लगी तो अंग्रेज़ों ने सोचा कि अब तो निकल लेने में ही भलाई है.. वरना ये दोनों प्रयोग कर करके ऐसी तैसी कर देंगे.. तो भिया अंग्रेज़ लोग निकल लिए पतली गली से..
अब चिचा बन गए वज़ीरे आज़म और चरखे वाले को बना दिया हिंदुस्तान का बाप.. हज़ारों साल पुराने एक देश का बाप सित्तर साल पहले पैदा किया गया.. देश की तमाम सड़कों.. सरकारी दफ्तरों.. नोटों पर बापजी की मूर्तियाँ, फोटुएं ठोंक दी गईं.. ये अलग बात है एक दिन एक सनकी राष्ट्रभक्त ने बापजी को ही ठोंक दिया था..
ख़ैर... इधर चिचा की तो पौ बारह हो गई... चिचा हिंदुस्तान के बेताज बादशाह बन गए.. सबसे पहले जीप घोटाले के साथ देश की तरक्की की नींव रखी.. कुछ दिन बाद चिचा भी निकल लिए किसी बीमारी के चलते.. लोग बताते हैं कि कोई गुप्त रोग हो गया था.. अब इतनी मौजमस्ती की थी तो ये तो होना ही था.. लेकिन अगला देश को आज़ाद कराकर गया था हिंदुस्तान का बादशाह था.. सो अगला नम्बर लगा गया उनकी लड़की का.. उसने भी उस नींव पर बड़ी भारी बिल्डिंग खड़ी कर ली.. इमरजेंसी भी लगा दी थी क्योंकि मालकिन थीं.. देश में ग़रीबी बहुत थी.. उसने नारा दिया.. गरीबी हटाओ रे.. पाल्टी के सारे नेता जी जान से भिड़ गए अपनी मालकिन के हुक्म की तामील करने में..उनकी पाल्टी के सारे नेता.. ऊपर से लेकर तो नीचे तक.. सारे सरकारी अफसर, कर्मचारियों, उनके साथ चलने वाले पत्रकार, ठेकेदार, दलाल.. उनकी हाँ में हाँ मिलाने वाले हर आदमी ने अपनी अपनी ग़रीबी दूर कर ली..
फिर एक दिन मालकिन को उन्हीं के घर में ठांय ठांय करके टपका दिया गया.. 10 दिन का राजकीय शोक.. देश भर में एक ख़ास धरम के लोगों को खोज खोजकर मारा गया.. लूटा गया.. उनकी बहन बेटियों पत्नियों पर ज़ुल्म ढाए गए.. क्योंकि मालकिन को उन्हीं के धर्म वालों ने मारा था.. हिम्मत कैसे हुई मालकिन को मारने की.. मालकिन के 2 बेटे थे, एक जल्दी निकल लिए थे.. दूसरे जहाज़ उड़ाया करते थे.. दुनिया घूमते थे सो नाच गाने, खाने पीने का भी शौक रखते थे.. एक बार डांसर पर दिल आ गया तो ले आये उसको ब्याह कर.. क़िस्से माँ के भी कम नहीं थे.. चिचा के भी नहीं थे.. परंपरा तो आगे बढ़नी ही थी..
ख़ैर.. मालकिन चली गई.. पाल्टी और देश के लोग अनाथ हो गए तो क्या करें.. जहाज़ उड़ाने वाले बेटे को पकड़ लाये.. बोले जहाज़ चला ही लेते हो अब देश भी चलाओ.. बड़ा आसान है.. उसको भी क्या तकलीफ थी.. देश भर में "सांत्वना की लहर" हिलोरे मार रही थी.. बेटा चुनाव लड़ा और ज़बर सीटें जीत लाया 400 से ऊपर..
फिर क्या था, देश विदेश में कहीं भी जाना हो तो दोई मियाँ बीवी जाते जहाज़ के अंदर घुसने से पहले खूब हाथ हाथ हिला हिलाकर टाटा, बाई बाई करते और फुर्र हो जाते.. देश में रहते तो कुर्ते पायजामें में, विदेश जाते तो जोधपुरी सूट.. मस्त काला चश्मा लगाकर जाते.. नए साल की छुट्टियां तो हर साल फिक्स रहतीं हीं थीं.. सेना के जहाज़.. तमाम सरकारी अफ़सर सेवा चाकरी के लिए साथ जाते थे..
एक दिन बेमौत मारे गए.. लाश तक बड़ी मुश्किल से पहचानने में आई.. अब बेचारे पाल्टी वाले और देश फिर से अनाथ हो गया.. एक एक करके क़ुरबानी ली जा रही थी.. फिर आया विदेशी बहू का नम्बर.. सबसे पहले तो उन्ने एक बुज़ुर्ग आदमी जो कि पाल्टी के अध्यक्ष थे उनको लात मारकर बाहर कर दिया.. बोली हमारे बाप दादाओं की पाल्टी है तू साले दो कौड़ी के ग़ुलाम तू कैसे यहाँ बैठा है.. चल रास्ता नाप..
असली खेल तो यहीं से शुरू हुआ.. कुर्सी चैये रे गुलामों कैसे भी करके.. राजनीति के सारे नियम क़ायदे वायदे ताक पर रख दिये गए.. जो राह में रोड़ा बना उसको या तो कुचल दो या ग़ुलाम बना लो.. सीधा सा एक ही फंडा.. कुर्सी चैये.. माल चैये.. हिंदुओं को ख़तम करो.. देशद्रोहियों को आगे बढ़ाओ.. देश और हिंदुत्व को खोखला करने वाले हर आदमी, संस्था, मिशनरीज की मदद करो.. आतंकियों के लिए ज़मीन तैयार करो.. देश भर में मासूमों की जान ले लो... सत्ता के लिए हिंसा भड़काओ.. अपने देश की, अपने ही लोगों की जान, माल को नुक़सान पहुंचाओ.. देश को बांटों.. साम दाम दंड भेद जो करना पड़े सब करो लेकिन सत्ता लाओ.. पॉवर लाओ.. कुर्सी लाओ.. पैसा लाओ..
जब सारे लोग इस ताक़त के आगे झुक रहे थे.. पैरों में गिर रहे थे.. मर रहे थे.. तब एक नायक का उदय हुआ इस राक्षस राज को चुनौती देने के लिए.. 13 साल तक उसको हर तरीक़े से रोकने, दबाने, कुचलने, बर्बाद, बदनाम करने के लिए... लेकिन मानों कोई दैवीय शक्ति उस नायक के साथ थी.. वो इनके बिछाए हर जाल, हर चाल को भेदता हुआ इनकी छाती पर चढ़ बैठा..
बर्दाश्त नहीं हो पा रहा है.. एक एक सेकंड एक एक सदी की तरह लग रहा है.. सत्ता के बिना पगला रही है.. मंदबुद्धि बेटे को लगा दिया काम पर.. जा तुझे जो समझ आये.. जैसे समझ आये.. सच झूठ.. जो बोलना पड़े बोल.. नायक ने जिस संसद की सीढ़ियों को नमन करके पहली बार कदम रखा वहाँ भी झूठ बुलवाया..
लेकिन उसने कहा था पहली बार कि "परिश्रम की पराकाष्ठा करूँगा और अपना रिपोर्ट कार्ड दूँगा"..
वो लगा है.. जब सत्ता में थे तब नहीं रोक सके तो अब क्या रोकोगे.. तुम्हारा अनुभव 125 सालों का है तो तुमसे लड़ते लड़ते उसका अनुभव 250 सालों का हो चुका है.. तुमको तुम्हारे ही हथियारों से मार रहा है..
2019 में फिर इतिहास रचेगा.. नोट कर लो..
Comments
Post a Comment