राहुल गांधी और उनकी शिक्षा

जानिए राहुल गांधी के बारे में जो देश का प्रधानमंत्री बनने के ख्वाब देख रहा है।

बात सन्  1989 की है। XIIth में मात्र 65% marks होने के बावजूद राहुल गाँधी को दिल्ली के St. Stephens College ने BA (History Hons) में दाखिला दे दिया था। इस बात को लेकर मीडिया में काफी बवाल हुआ। जब दूसरे छात्रों के लिए cut off मार्क 90% के लगभग था तो राहुल को किस आधार पर 65% पर ही दाखिला दे दिया गया? मीडिया में प्रश्न उठा कि क्या राहुल गाँधी को ईसाई होने की वजह से कम अंक होने के बावजूद दाखिला दिया गया है? अब गाँधी परिवार सार्वजनिक रूप से यह स्वीकार करना नहीं चाहता था कि राहुल गाँधी कैथोलिक क्रिस्चियन हैं। इसलिए St. Stephen's प्रशासन से यह कहलवाया गया कि राहुल गाँधी को sports quota में एडमिशन मिला है। लोगों का माथा ठनका। sports quota? कौन सा स्पोर्ट्स भईया? राहुल गाँधी किसी खेल में प्रवीण थे ऐसा तो कभी किसी ने ना सुना ना देखा? तो St. Stephen's ने कहा कि राहुल को shooting में पारंगत होने की वजह से उन्हें स्पोर्ट्स कोटा के लिए consider किया गया है। लो जी, ये अच्छा खेल बताया। क्रिकेट, फुटबॉल, हॉकी या टेनिस कहते तो झट से कोई पूछ बैठता कि कौन सी प्रतियोगिता खेली है इन्होंने? पर शूटिंग कौन फॉलो करता था उस वक़्त? फिर भी कुछ लोग पूछ ही बैठे कि भाई, सिर्फ किसी खेल में पारंगत होने की वजह से स्पोर्ट्स कोटा में एडमिशन नहीं मिलता।
उसका क्राइटेरिया होता है कि अगर आपने राज्य स्तर पर वह खेल खेला है तभी आपको स्पोर्ट्स कोटा के लिए consider किया जाएगा।

खैर, बात आई गई हो गई। प्रधानमंत्री का बेटा जो ठहरा। किसकी हिम्मत बात को आगे बढ़ाए? पर कुछ उड़ती-उड़ती खबरें Stephen's से राहुल गाँधी के बारे में मिलने लगीं। बताया गया कि कक्षा के अन्य छात्रों का बौद्धिक स्तर उनके स्तर से कहीं ऊपर था। राहुल गाँधी के बेवक़ूफ़ी भरे सवालों पर वो हँस देते। राहुल कक्षा में अलग-थलग पड़ गये और धीरे-धीरे कुंठा का शिकार होने लगे। एक साल के अंदर उन्होंने St Stephen's छोड़ दिया। बताया गया कि वे Harvard जा रहे हैं।

सच्चाई ये है कि राहुल गाँधी के बारे में जो कहानियाँ हमें स्टीफेंस वालों ने सुनाई थीं वो झूठी थीं। यूँ ही किसी को हार्वर्ड में दाखिला तो नहीं मिल जाता न ! कुछ तो बात होगी बंदे में! पर ये क्या? एक वर्ष बाद खबर आई कि राहुल गाँधी ने अब हार्वर्ड भी छोड़ दिया।
अगर कोई NIT Kurukshetra में एडमिशन लेने के एक साल बाद यदि इसलिए उसे छोड़ देता है कि उसे IIT Delhi में एडमिशन मिल गया है तो बात समझ मे आती है। पर यदि वो फिर एक साल में IIT भी छोड़ दे तो आप क्या कहेंगे? यही न कि ये लड़का भोंदू है, ये सब जगह फेल हो रहा है। पर इस बार राहुल गाँधी कहाँ गए, किसी को पता नहीं चला। यह बात गुप्त रखी गई। इस दौरान उनके पिता की हत्या भी हो गई, तो हमें लगा कि शायद सुरक्षा कारणो से उनका लोकेशन public नहीं किया गया है। खैर, राजीव गांधी की मृत्यु के बाद राजनीति ने काफ़ी करवटें बदलीं।

देश का प्रधानमंत्री बनने के बाद नरसिम्हा राव कांग्रेस पार्टी के भी सर्वशक्तिमान नेता बन गए। गाँधी परिवार की एक नहीं चलने देते थे। पर 1996 में वो चुनाव हार गये और फिर यूनाइटेड फ्रंट की अल्पकालिक सरकार बनी। उसके बाद हुए चुनावों में अटल बिहारी वाजपेयी विजयी हुए। इस बीच सोनिया गाँधी ने कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष सीताराम केसरी को धक्के मार कर कांग्रेस कार्यालय से बाहर फिंकवा दिया और खुद कांग्रेस अध्यक्ष की कुर्सी पर काबिज हो गईं। और फिर जो होना था वो हुआ। वंशवाद की बेल फिर से प्रस्फुटित होने लगी। 2004 के चुनावों के ठीक पूर्व राहुल गाँधी सात समंदर पार से अचानक भारत आ धमके और अमेठी से लोकसभा चुनाव के लिए पर्चा दाखिल कर दिया। उन्हें अपने पिता की विरासत जो संभालनी थी। 2004 के चुनावों में वाजपेयी जी की अप्रत्याशित हार हुई और राहुल गाँधी की अम्मा ने गुलाम वंश की स्थापना की। भारत के साथ इटली की नागरिक होने की वजह से वो खुद तो प्रधानमंत्री बन नहीं सकती थीं और ना ही ताजे ताजे राजनीति में कूदे राहुल गांधी को बना सकती थीं। तो मैडम जी ने मनमोहन सिंह नामक एक कठपुतली को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बिठा दिया और पुत्र के साथ मिलकर पीछे से उसकी डोर खींचने लगीं।

खैर, मूल मुद्दे पर वापस आते हैं। तो साहब, जब राहुल गाँधी लंबे विदेश प्रवास के बाद भारत वापस लौटे तो प्रश्न लाजमी था कि उन्होंने इतने सालों तक विदेश में किया क्या? पार्टी के नेता टीवी चैनलों पर कहने लगे कि राहुल ने पढ़ाई पूरी करने के बाद एक मल्टीनेशनल कंपनी जॉइन की। पर देशसेवा की इच्छा पैदा हुई तो वो अपनी लाखों की नौकरी छोड़कर भारत चले आये। अब यह प्रश्न उठना स्वाभाविक था कि राहुल बाबा कौन सी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करते थे? पर ना उन्होंने कभी यह बात किसी इंटरव्यू में लोगों को बताई ना ही उनकी पार्टी ने।

आप अपने कैरियर के बारे में कोई बात तभी छुपाते हैं जब आपको उसे बताने में शर्मिंदगी का अहसास हो। जाहिर है राहुल को भी‌‌ शर्मिंदगी का अहसास होगा तभी वह अपनी नौकरी के बारे में देश से छुपाते फिरते हैं। ना ही सिर्फ नौकरी, बल्कि अपनी शिक्षा के बारे में जानकारी भी वह छुपा गये।

2004 में वापस आये तो कांग्रेसी उनकी शिक्षा के बारे में अलग-अलग बातें कहते थे। किसी ने कहा कि राहुल ने MBA किया, किसी ने M.Phil बहरहाल राहुल चुनाव जीत गये। परन्तु लोगों में जिज्ञासा बनी हुई थी कि इस आदमी ने जब भारत छोड़ा तो यह गया कहाँ था?

पार्लियामेंट की साइट पर सभी सांसदों के डिटेल्स दिए होते हैं। ये डिटेल्स सांसद स्वयं ही लोकसभा सचिवालय को देते हैं जो उसे वेबसाइट पर डाल देते हैं। वहाँ जनाब ने अपनी शैक्षणिक योग्यता में क्या डाला हुआ था- M.Phil.आगे लिखा हुआ था Educated at Trinity College, Cambridge University, UK.

मतलब सिर्फ highest qualification. M.Phil. के पहले क्या? M.A, और किया तो कहाँ से? उसके पहले B.A भी तो किया होगा। वो कहाँ से किया, किस विषय में, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं दी? राहुल के सहयोगी सचिन पायलट, सिंधिया, कपिल सिबल की biography देखो।

पर वहाँ तो कुछ और ही नज़ारा‌ है। सबने B.A.upwards अपनी डिग्री के बारे में बताया हुआ था। ज्योतिरादित्य ने तो अपने स्कूल का भी ज़िक्र किया हुआ था क्योंकि वह दून स्कूल से पढ़े हैं। अब आते हैं उनके shooting में पारंगत होने के ऊपर।

यदि राहुल गाँधी shooting में पारंगत हैं तो पार्लियामेंट साइट पर उनकी बायोग्राफी में "Sports and Clubs' column में shooting ज़रूर लिखा होगा। पर ये क्या? उस कॉलम में shooting का कोई ज़िक्र तक नहीं। वहाँ जिन 4 खेलों का नाम लिखा हुआ है वो हैं - Swimming, Cycling, Running and Aikido.

झूठ बोलने की भी हद्द है। St. Stephen's में एडमिशन के वक़्त असली कारण (क्रिस्चियन होना) न बताकर, स्पोर्ट्स कोटा का झूठ गढ़ना, यह इसकी अनैतिकता की तरफ इशारा करता है। राहुल गाँधी जो कि प्रधानमंत्री बनने के सपने देखता है, अपनी शिक्षा, नौकरी के बारे में जानकारी देशवासियों से छुपाता है।

हमें पता तक नहीं कि 2004 में भारत वापस आने के पहले यह किस कंपनी में किस पद पर क्या काम करता था? जितने साल इसने नौकरी की, इसका career graph कैसा था? क्या इसे promotion मिले थे? और अगर मिले थे तो वो क्या या फिर कोई प्रोमोशन ही नहीं मिला था भाई को। क्या वह इतना निकम्मा था?

आज वही है, जिसे‌ कोई जॉब नहीं मिली, मिली भी तो ऐसी नहीं मिली जिसके बारे में वो गर्व से दुनिया को बता पाये, वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर अपने ही देश का, देशवासियों का, मज़ाक बना रहा है।  राहुल गाँधी एक ऐसा नेता है जिसे राजनीति के बाहर कोई चपरासी की नौकरी भी न दे।

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