अति आत्मविश्वास भाजपा के कर्णधारों को महँगा ना पड़ जाये

गुजरात हारते हारते बचे, कर्नाटक जीतते जीतते रह गए, फिर भी ...बीजेपी अपने पैरों पे कुल्हाड़ी मारने में लगी है
सभी राष्ट्रवादी, सनातनी हिन्दू ध्यान से पढ़ें :---
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गुजरात हारते हारते कैसे बचें ??? :---
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**गुजरात में लगभग 20-25 सीटों का फैसला 200 से 2000 वोटों के अंतर से हुआ था। और लगभग इसी औसत से बीजेपी से नाखुश लोगों ने NOTA भी दबाया था। परिणाम बीजेपी 115 से घट कर 98 पर, और कांग्रेस 42 से बढ़ कर लगभग 85 सीटों तक पहुँच गयी।
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**कर्नाटक में जीतते जीतते कैसे बचें ?????
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कर्नाटक में भी 30 - 35 सीटों पर हार जीत का  अंतर 200 से 2000 वोटों के बीच ही  रहा, और बीजेपी से नाखुश लोगों का NOTA दबाने का औसत भी यही था।
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अब मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़  के चुनावों में हवा का रुख किस ओर है ये जल्दी पता लगने वाला है।
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जब जब बीजेपी की सरकार किसी राज्य या केंद्र में सत्तारूढ़ हुई  वो अपने मूल आधार सवर्ण समाज के वोट से ही सत्तारूढ़ हुई।:--
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जो  समाज इस उम्मीद में वोट देता रहा  है कि बीजेपी सरकार बनने पर बिना किसी भेदभाव के राष्ट्रहित, धर्म हित समाज हित में काम करेगी।
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  1990 से  बीजेपी के नारे क्या रहे जिस पर वो सत्तारूढ़ हुई ?  वे संकल्प थे --
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(1) राम मंदिर निर्माण
(2) धारा 370 हटाना
(3) समान नागरिक संहिता
(4) सबका साथ सबका विकास- तुष्टिकरण किसी का नहीं।
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अटल बिहारी वाजपेयी में , उनके लच्छेदार भाषणों में, उन्हें एक राष्ट्रवादी, सनातनी हिन्दू नेता की छवि दिखाई दी। इस उम्मीद और उपरोक्त इन्हीं नारों की लहर पर सवार  होकर केंद्र और राज्यों में बीजेपी की सरकारें बनीं
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पर अफसोस अटल जी, गठबंधन की सरकार चलाने में,  सत्ता का संतुलन बनाने में अपने घोषित सिद्धांतों से विरत हो समझौते पर समझौता करते चले गए, और जिन सिद्धांतो, जिन उद्देश्यों को लेकर बीजेपी सत्ता में आई थी वे भुला दिए गए फलस्वरूप NDA-1 का कार्यकाल अच्छा होते हुए भी बीजेपी सत्ता से बाहर हो गयी।
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लालकृष्ण आडवाणी जिन्हें बीजेपी को  शिखर पर पहुंचाने का श्रेय दिया जाता है, वे भी सेकुलर बनने के चक्कर में, पाकिस्तान में जाकर भारत विभाजन के खलनायकों में से एक मुहम्मद अली जिन्ना की मजार पर जाकर उनकी तारीफ करने लगे, फलस्वरूप भारतीय राजनीति में हाशिये पर पहुँचा दिए गए।
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10 साल के लिए बीजेपी को केंद्र की सत्ता से वनवास मिला।
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1990 से लेकर अटल जी की सरकार NDA-1 और अब 2014 में नरेंद्र मोदी-बीजेपी की सरकार बनने तक, पहले 3 संकल्प (राम मंदिर निर्माण, समान नागरिक संहिता, धारा 370 हटाना) आज 28 वर्ष पूरे होने को हैं मगर पूरे नहीं हुए।
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जबकि अटल बिहारी वाजपेयी की केंद्र में सरकार को पहली बार केवल13 दिन,  दूसरी बार केवल 13 महीने फिर तीसरी बार में 5 साल का कार्यकाल पूरा करने को मिला। और अब इस सरकार का भी 4 वर्ष का कार्यकाल पूरा हो  कर पाँचवाँ वर्ष चल रहा है।
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(4) संकल्प  सबका साथ सबका विकास ,तुष्टिकरण किसी का नहीं। (पर हो इसके विपरीत रहा है, केंद्र की बीजेपी सरकार ने तुष्टिकरण की सारी हदें पार कर दी हैं)
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तो अटल सरकार में  वोट बैंक की तुष्टिकरण के नाते, सामान्य वर्ग के विरुद्ध कई कानून बने।  जिस कारण,
सामान्य वर्ग की उदासीनता अटल सरकार को ले डूबी।
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नरेंद्र मोदी की 2014 में वापसी भी उसी लहर का परिणाम था। लोगों को उनमें भी एक राष्ट्रवादी, सनातनी हिन्दू की छवि दिखाई दी।  एक बार फिर, मध्यम वर्ग, राष्ट्रवादी, सनातनी हिंदुओं को नरेंद्र मोदी में उम्मीद की किरण दिखाई दी।
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उस लहर में लाखों व्यक्तियों ने  अपना योगदान दिया था और प्रचण्ड बहुमत से बीजेपी सत्तासीन हुई केंद्र में फिर 22 राज्यों में।
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चुनाव भावनात्मक आधार पर लड़े और जीते जाते हैं।
लाखों लोगों की जनभावना जब समर्पित और निःस्वार्थ भाव से देश,धर्म, संस्कृति के हित में किसी राजनैतिक दल का समर्थन करती है तब लहर पैदा होती है और उस दल को प्रचण्ड बहुमत प्राप्त होता है।
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जो राजनैतिक दल इस जनभावना की उपेक्षा अवहेलना कर अपने  जोड़ तोड़ और निहित स्वार्थ  के कारण दल से जुड़े  नेताओं,कार्यकर्ताओं के भरोसे चुनाव जीतने की योजना बनाते हैं वे मुंगेरीलाल के हसीन सपने देखने के समान हैं।
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बीजेपी  के रणनीतिकार, यही गलती कर रहे हैं:---
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(1) निहित स्वार्थ से जुड़े, लोभ-लालच देकर खरीदे गए लोग, लहर नहीं पैदा कर सकते क्योंकि जनता उन स्वार्थलोलुप क्षेत्रीय लोगों अच्छी तरह पहचानती है।
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(2) और भावनात्मक जुड़ाव वाले ऐसे लोग जो लहर पैदा करते हैं वे बिका नहीं करते !!!!!!!
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इस बार फिर सामान्य वर्ग को हाशिये पर ढकेल कर तुष्टिकरण का ढिंढोरा पीटा जा रहा है हमने दलित पिछड़े गरीबों के लिए ये किया, हमने वो किया। फिर सामान्य वर्ग का बीजेपी से मोहभंग हो रहा है।
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SC/ST एक्ट में सुप्रीम कोर्ट के इस न्यायपूर्ण आदेश, कि बिना जाँच के गिरफ्तारी नहीं होगी, को वोट बैंक की तुष्टीकरण की राजनीति में, अध्यादेश लाकर, सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निरस्त करने का  निर्णय कर बीजेपी ने अपने पैरों में कुल्हाड़ी मारने का काम किया है और सवर्ण समाज के जले पर नमक छिड़कने का कार्य किया है।
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SC/ST एक्ट पर केंद्र सरकार के अध्यादेश के खिलाफ पूरे देश मे आक्रोश है। इसके विरोध में धरना-प्रदर्शन करने वालों पर पुलिस  लाठियाँ  भांज कर बहादुरी दिखा रही है। गिरफ्तारियां कर रही है।  क्या यही है न्याय ?
क्या यही है सबका साथ- सबका विकास ??????
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मैं मोदी विरोधी नहीं हूं  2019 में उन्हें जीतते हुए देखना चाहता हूं , पर  जो संदेश सामान्य वर्ग में जा रहा है वो आशंकित कर रहा है।
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जिनको रिझाने के लिए पलक पांवड़े बिछाए जा रहे हैं वे अपनी जाति के भ्रष्ट नेताओं को छोड़ किसी के नहीं होते।
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      02 अप्रैल का अकारण भारत बंद, विभिन्न राज्यों में धरने, प्रदर्शन, तोड़ फोड़, आगजनी , इसके ज्वलन्त प्रमाण हैं। उन्हें देश, धर्म से नहीं केवल अपने स्वार्थ से मतलब है। वे 2019 में बीजेपी का साथ नहीं देंगे।
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और उपेक्षित सामान्य वर्ग की सोच ये बन रही है --
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कोउ नृप होय हमें का हानि,
चेरि छांड़ि नहिं होउब रानी।
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तो फिर ? समय हाथ से निकलता जा रहा है। मोदी, बीजेपी और उनके समर्थक समय रहते सचेत हो जाएं। इसी में समझदारी है।
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काश! ये जन जन की भावना बीजेपी के कर्णधारों के कानों तक पहुँचे।

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