मेरी चुनावी यात्रा

मैंने जीवन में केवल एक ही बार चुनाव लड़ा था,वो भी 12th के सेक्शन B में मॉनिटर का, हालाँकि उस दौर में हिन्दू मुसलमान और दलितो में वोट नही बाँटे होते थे,पर राजनीति तो थी,
मेरा मुकाबला था मढौरा के धनीमानी हस्ति देवेंद्र सिंह का बेटा सौरभ सिंह और प्रतिभा सिंह के साथ।
हमारी क्लास में 59 छात्र/छात्रा थे, क्लास में ब्राह्मण, राजपूत, यादव और बनियो का दबदबा था, और मेरे करीबी मित्रो में यादवों और राजपूतों का शुमार था और ब्राह्मण मैं था हीं, सो मेरी जीत सुनिश्चित थी।
मेरे एक मित्र राजीव सिंह ने मुझे बहुत समझाया कि ठाकुर जी रैण दयो,आ टेढो काम है, तेरे से ये नहीं होने वाला। मैंने कहा अबे जा तू दुश्मनों से मिला हुआ हैं।
मैं लोकल बॉडी, वो पड़ोसी गाँव का, ऊपर से क्लास में मेरे समर्थक उससे ज्यादा हैं, बता वो कैसे जीतेगा ??

वो  4 रिफिल वाले पेन के बटन ऊपर नीचे करता सिर्फ मुस्कुराता रहा।

चुनाव का दिन आ गया, हमारे सर कृष्ण कांत ओझा जी के नेतृत्व में वोटिंग हुई और 59 छात्रों की क्लास में मुझे वोट मिले 11
मैं 42/11 मॉनिटर का चुनाव हार गया।

बेईज्जती और क्रोध से मैं और मेरा अन्तर्मन सुलगता रहा, सबसे बोलचाल बंद।

छुट्टी हुई सब बाहर निकले, जैसे ही घर की तरफ मुड़ा एक हाथ कलाई को खींचकर बस स्टैंड की और ले चला।
मैंने कहा छोड़ मेरा हाथ सालो तुम सब धोखेबाज हो, तुम लोगो ने खूब ज़लील करवाया मुझे।

वो मुझे ज़बरदस्ती धूपी की दुकान पर ले गया, 200 ग्राम पकौड़ी और और हाफ लीटर माज़ा का ऑर्डर हुआ।
मैं फिर उठने लगा, उसने फिर खींचा, मैंने जोर से हाथ झटका और जाने लगा ,
पीछे से उसकी आवाज तुझे 11 वोट मिले थे ठाकुर जी ,
मैंने चौंक कर उसकी और देखा, वही चिरपरिचित मुस्कान।
मैं वापस आकर बैठ गया।
कमीने तू ??
हाँ मैं,अब आजा।

मैंने उससे लाखो बार पूछा कि बनिये बता कौन सी विधा से तूने पता लगाया था कि मैं हार जाऊँगा।

वो ज़ोर से हँसा और हँसता ही चला गया,और लास्ट में बोला धूपी का भुगतान करें तो बताऊँ।

मैंने कहा सालो तुम लोगो के चक्कर में साल भर की पॉकेट मनी एडवांस में खर्च हो गई, बिल कहाँ से दूं।
तो फिर इतना समझ ले राजनीति वो नही होती जो दिखती हैं, राजनीति संभावनाओं की चौखट पे स्वार्थो की चौकीदार हैं, यहाँ निज लाभ के लिये पीठ में खंजर आम बात हैं।

हमेशा मुस्कुराते रहने वाले के चेहरे पे एक अजीब सी ख़ामोशी थी। और मैं उसकी बात समझने का प्रयत्न करता रहा।

"ठाकुर की कलम से"

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