इमरजेंसी में रात का समय था एक आदमी को उसके घर वाले ले कर के आये,शायद दो पक्षों के विवाद में उसको चोटे आई थी जांच करने पर पता चला उसके पैर की हड्डी में फ्रैक्चर था ।
मरीज को भर्ती किया गया और आगे का उपचार शुरू हुआ।
चूँकि फ्रैक्चर इतना गंभीर नहीं था तो कुछ दिनों बाद उसे छुट्टी दे दी गयी और घर पर ही रहने की सलाह दी गयी हालांकि वो अभी भी बिना सहारे के चल पाने में असमर्थ था तो डॉक्टरों ने उसके इस समस्या के हल के रूप में उसे बैसाखी दे दी जो सरकारी अस्पताल में मुफ़्त में मिलती थी और बैसाखी देते वक़्त बोला गया कि *ये सरकार की तरफ से है इसलिए इसकी उपलब्धता की संख्या और सीमा निर्धारित है तो जब आप खुद से चलने में समर्थ हो जाना तो इस बैसाखी को लौटा देंना ताकि ये भविष्य में आने वाले आप जैसे लोगों के भी काम आ सके*
फिर उसको कुछ जरुरी दवाये लिख के छुट्टी दे दी गयी।
दवा लेने सरकारी दवाखाने पंहुचा तो वहाँ लम्बी लाइन लगी थी तो वो भी लाइन में लग गया,लाइन में लगे बाकि लोगो ने जब उसके पैर में प्लास्टर बंधा और बैसाखी के सहारे खड़े देखा तो मानवता के चलते उसे आगे जाने दिया और उसे दवा जल्दी ही मिल गयी .
बाहर निकला स्टेशन जाना था तो ऑटो पकड़ने पंहुचा,ऑटो रुकी तो ऑटो वाले ने भी उसकी लाचारी को देखते हुए उसके सामान को उठा के रख दिया और उसको भी चढ़ने में मदद कि और स्टेशन तक छोड़ा.
ट्रेन पकड़ने पहुंचा तो ट्रेन में बहुत भीड़ थी किसी तरह ट्रेन में चढ़ा तो बैठने की जगह ना होने से खड़ा रहना पड़ा फिर लोगो ने देखा कि बेचारा बैसाखी के सहारे एक आदमी खड़ा है तो एक आदमी ने उठ कर उसे अपनी सीट दे दी और वो घर आराम से पहुच गया .
रात बीती, मेडिकल लीव भी ख़त्म हो चुकी थी तो ऑफिस जाना था,सुबह तैयार हो के बाहर निकला और बस का वेट करने लगा। पड़ोसी ने देखा कि बेचारा बैसाखी के सहारे चल रहा है तो उसे ऑफिस तक अपने स्कूटर पर छोड़ आये.
इतने दिन बाद ऑफिस पंहुचा था तो काम बहुत था लेकिन ऑफिस कलीग्स ने भी उसके लाचारी पर सहानभूति दिखाई और उसके ज्यादातर काम उन्होंने करके उसका हाथ बटाया मतलब ऑफिस में भी आराम रहा आज तो .
घर लौटा तो साथ वाले कर्मचारी ने घर तक छोड़ दिया .
दिन बड़ा आराम से बीता उसका,ना बस से आने जाने की किच किच हुई ना ही ऑफिस में काम के लिए कुछ कहा गया .खाना खा के सोने गया तो नींद नहीं आ रही थी शायद दिमाग में कुछ चल रहा था...
*अगर मैं ठीक ना होने का नाटक करूं तो ऐसे ही लोगों की सहानभूति मिलती रहेगी*
*या फिर ये बैसाखी ही ना छोड़ूं तो ?? इसके साथ होता हूं तो सारे काम आसानी से हो जाते है*
*और फिर ये बैसाखी अपने बच्चे को दे दूं तो..??वो भी मेरी तरह फायदा उठा पायेगा*
और फिर उसने अस्पताल में बैसाखी वापस नहीं की .
*ऐसे ही कई मरीजो ने किया और कुछ दिनों में ही सरकारी बैसाखियां जो लोगो के मदद के लिए थी ख़त्म हो गयी और हर बैसाखी कुछ चंद लोगो की व्यक्तिगत बन चुकी थी जिसे वो अपने बच्चों को थमाने का प्लान बना चुके थे...*
और उसके जैसे दूसरे मरीज़ बैसाखियों के आस में बैठे है..
आखिर कब तक लोग उसके झूठ को सहते और अनदेखा करते,एक दिन विरोध तो होना ही था...
फिर आगे क्या हुआ वो हम सब देख और महसूस कर रहे हैं.
#आरक्षण
Comments
Post a Comment