मित्रों!
वामपंथियों को यह अहंकार रहता है कि वह बहुत पढ़ते लिखते हैं, या पढे लिखे होते हैं...बाकी दक्षिण पंथी तो काला अक्षर भैंस बराबर होते हैं...!
तो इनके पढ़ने लिखने पर टिप्पणी करने से पूर्व एक निष्कर्ष दे दूं कि पिछले 150 या 70 वर्षो में पढे लिखे भारतीयों ने ही देश को लूटा खसोटा और सर्वनाश किया है। तो तुम्हारी पढ़ाई और लिखाई की तो ऐसी की तैसी..!
क्या पढे हो बे...??
डॉक्टरी, इंजीनियरी, लोहारी आर्किटेक्ट, चमड़ा निर्माण..?
क्या पढे हो जिससे समाज की प्रोडक्टिविटी बढ़ी हो..?
तुमसे तो अच्छे वे अनपढ़ किसान है जो अनपढ़ हैं परंतु 125 करोड़ भारतीयों को जिंदा रखने के लिए भोजन और अनाज पैदा करते हैं।
अब जब बात पढ़ने लिखने की है तो वो भी बात कर लेता हूँ। जो भी छपा है - यदि वह भाषा तुमको आती है तो तुम पढ़ लिख सकते हो ।
चाहे वह सड़क छाप चौरसिया हो, शोभा डे की इलीट पोर्नोग्राफी की किताब हो, रोमिला थापर की बकवास हो।
लेकिन यही यदि चीनी में लिखा हो तो ?
तुम भी जाहिलियत की श्रेणी में आ गए।
तुमको तो सूचना और कुसूचना का भेद नही पता लेकिन उसको पढ़कर चींटे की तरह पिछवाड़ा ऊंचा किये घूम रहे हो अहंकार से।
तुम जैसे पढे लिखे लोगों की तरह ही पिछले शताब्दी में आर्यन अफवाह को पढ़कर चम्बरलीन ने "फॉउंडेशन्स ऑफ 19th सेंचुरी" लिखी - जिसके कारण पूरे जर्मनी के ईसाइयों ने बाइबिल के infedilism के सिद्धांत को अपनाते हुए अपने पास पड़ोस में रहने वाले एक करोड़ यहूदियो और जिप्सियों का कत्ल किया।
भूल गए ?
तो पढ़ने लिखने का अहंकार न पालो।
क्या पढ़ते हो यह महत्वपूर्ण है - गीता पढ़ते हो या कम्युनिस्ट मैनिफेस्टो - दोनों ही माइंड मैनीपुलेशन करती है।
लेकिन एक मानव को मानवता सिखाती है, दूसरी मनुष्य को राक्षस बनाती है।
तुम तय करो कि बेहतर कौन ?
पढे लिखे या अनपढ़...!!
वैसे ये पढे लिखे लोग सारी क्रांति अनपढ़ गरीब किसान, आदिवासी और मजदूरों को बरगला के करते है वही अनपढ़ लोग जब थोड़ा समझदार हो जाते इनको पूछना बन्द कर देते तो उन्हें ये सो कॉल्ड ज्यादा पढ़े लिखे अर्बन नक्सली जाहिल गंवार बोलना शुरू कर देते है..!!"ठाकुर की कलम से"
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