Progressive/Grow Cast Yadav/Ahir

पूर्वांचल मने ऊपी बिहार में अहीरों से एक स्वाभाविक चिढ़ का एक सबसे बड़ा कारण ये है कि इस कौम ने समाज के हर क्षेत्र में जबरदस्त grow किया है । आज यादव हमारे समाज की सबसे ज़्यादा progressive कौम है । ये समाज मे तेजी से सम्पन्न हो रहे हैं , इनका living Standard बहुत तेजी से बढ़ा है , ये गांव -- समाज के सबसे ज़्यादा प्रभावशाली वर्ग बन के उभरे हैं और Politically भी बहुत प्रभावशाली हैं । इसके अलावा बिज़नेस , माफियागिरी , गुंडागर्दी , दबंगई हरेक फील्ड में ये top पे पहुंच रहे हैं ।
आज से 30 -- 40 साल पहले ये स्थिति नही थी । इनमे ये सामाजिक बदलाव सिर्फ और सिर्फ इनके अथक परिश्रम के कारण आया है . 70 के दशक में जब यादवों ने घर से बाहर कदम बढ़ाया और मुम्बई हबड़ा सूरत लुधियाना दिल्ली पहुंचे तो किसी भी किस्म का श्रम करने से पीछे न रहे । अपने गांव में भी रहे तो गांव में पान लगाने से ले के छोटी मोटी चाय मकुनी घुघुनी की दुकान करने से नही चूके ........ किसी अहीर ने कभी ये नही सोचा कि पान बेचना तो बरई चौरसिया लोगों का काम है , या फिर बर्फी लौंगलता बेचना तो हलवाइयों का काम है , या सैलून खोल के बार बनाना तो नाइयों का काम है ..इन्होंने बेहिचक ये काम किये और पैसा कमाया । मुम्बई में ये सड़क किनारे गन्ने का जूस और वड़ा पाव बेचते नज़र आते हैं , और फिर साल भर बाद जब घर वापस आते हैं तो suitcase में रुपया भर के लाते हैं । पूर्वांचल में जमीनों के दाम इन्ही अहीरों ने मुम्बई सूरत में इसी तरह Road side छोटे छोटे काम ( जिन्हें शुरू करने में पूंजी नही सिर्फ श्रम लगता है ) करके पैसा कमा के बढ़ाये हैं ।
जहां अहीरों ने जातिगत पेशे की जड़ता को तोड़ काम किया वहीं इसके विपरीत ठाकुर, ब्राह्मण इसी सोच में डूबे रहे कि हाय , लोग क्या कहेंगे ......... और उन्होंने अपना खुद का काम न कर किसी सेठ के पास 5000 रुपल्ली की नौकरी करना ज़्यादा श्रेयस्कर समझा ।

हमारे हियाँ के चर्मकार पहले मरे हुए जानवरों का चमड़ा छील बेचते थे । एक पशु का चमड़ा उतारने में एक घंटा लगता था और 450 रु में वो खाल बिक जाती थी । एक व्यक्ति एक दिन में 3 -- 4 जानवर निपटा देता था ........ फिर हमारे चर्मकार भाई लोग को इनके नेताओं ने समझा दिया कि ये तो बहुत छोटा काम है जिसे पुराने जमाने मे इन मनुवादियों ने हमारे ऊपर थोप दिया था सो अब हम ये काम नही करेंगे .......... हमारे इलाके के सब पशु यूँ ही सड़ने लगे । फिर हमारे बगल के रामजी चर्मकार ने विद्रोह कर दिया और बोले , तुम्हारी ऐसी की तैसी ........ हम तो उतारेंगे , और इस तरह राम जी अकेले मरे पशुओं का चमड़ा उतारने लगे , दिन भर चमड़ा उतारते , शाम को छक के दारू पीते ........ विद्रोह के कारण उनको बिरादरी से निकाल दिया गया और हुक्का पानी बंद हो गया । जात बदर हुए तो बहू बेटा भी अलग हो गए .........
इलाके के सब चर्मकार जिसे अपना चमड़ा बेचते थे वो बगल का एक मियाँ था ......... He was an Opportunist ........उसने मौका सूंघ लिया ....... उसे लगा कि ये सही मौका है करोड़ों रु के कारोबार पे कब्जा करने का ........ उसने कुछ कसाइयों को recruit किया और एक Pikup खरीदी । उसमे बाकायदे hydraulic system से एक छोटी क्रेन लगाई और मशीन की सहायता से मरे जानवरों का चमड़ा उतारने लगा । जो काम manually एक घंटे में होता उसे उसके आदमी मशीन से जानवर को उठा के ,टांग के , 10 मिनट में कर देते ।
आज उसका ऐसा तंत्र है कि वो आसपास के 4 -- 5 जिले का चमड़ा उतारता है और उसकी एक बड़ी Tannery है कानपुर में ........ बताया जाता है कि आज वो करोड़ों पति है ।
दिलीप चूतिया मंडल जैसे नेताओं  के चक्कर मे पड़ के हमारे चर्मकार भाइयों ने अपना पुश्तैनी धंदा , थाली में परोस के मुसलमानों को सौंप दिया । अपने इर्द गिर्द नज़र दौड़ाइये , हर वो काम जिसमे हाथ का हुनर और परिश्रम चाहिए , उसपे मुसलमान काबिज है । आप बेशक़ उन्हें पंचर लगाने वाला कह के बेइज़्ज़त करें , पर उनका अनपढ़ होना ही उनके लिए वरदान साबित हो रहा है , वो अनपढ़ हैं इसलिए Skill सीख के परिश्रम करके मोटा पैसा कमा रहे हैं और आप तो भाई Convent Educated Highly Qualified डिग्रीधारी हैं इसलिए बेरोजगारों की लाइन में खड़े मोदी को गरिया रहे हैं .........

अब वो समय आ गया है कि अपनी डिग्री की बनाओ बत्ती .......... और इसे डालो अपनी ** में , अबे सड़क पे निकलो , कोई Skill सीखो , हाथ काले करो और पैसा कमाओ । वरना कल को रोते रहना की पूरी economy पे तो इन अनपढ़ मगर skilled परिश्रमी लोगों ने कब्जा कर लिया और हमको गुलाम बना लिया ।

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