'फ्लैग' से करेंगे सबका स्वागत


'फ्लैग' से करेंगे सबका स्वागत

इस बार सोचा था 'टाइगर' के बारे में लिखने से पहले एक दिन रुकूंगा। रुकने का कारण था अन्य समीक्षकों की प्रतिक्रियाएं जानना। देखना चाहता था इस फिल्म की सबसे आपत्तिजनक बात पर कोई कुछ लिखता या बोलता है क्या।  राष्ट्रवाद की बातें करने वाले या राष्ट्रवादी पार्टी इस पर कुछ बोलती है क्या। कल से चहुँ ओर व्याप्त सन्नाटे को देखकर इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि एक भारतीय फिल्म में 'पाकिस्तानी ध्वज' फहराने का दृश्य अब देश को विचलित नहीं करता। शायद दर्शकों ने सलमान ख़ान का 'पाकिस्तान प्रेम' इस झोंक में स्वीकार कर लिया है कि भाई बोल रहा है तो सच ही बोल रहा होगा। 

'टाइगर ज़िंदा है'
समीक्षा
निर्माता : आदित्य चोपड़ा
निर्देशक : अली अब्बास ज़फर

इराक के एक अस्पताल में चालीस नर्सों को आतंकियों ने बंधक बना लिया है। इन चालीस नर्सों में पंद्रह पाकिस्तानी हैं। एक नर्स दूतावास को सूचित करती है। दूतावास पीएमओ में सूचना देता है कि अस्पताल में 'केवल पच्चीस भारतीय नर्स' बंधक हैं। शिनॉय टाइगर की मदद लेता है। टाइगर अपनी टीम बनाता है। टाइगर की टीम में एक मुस्लिम है। एक दृश्य में मुस्लिम रॉ अधिकारी को दूसरा हिन्दू रॉ अधिकारी ताना मारता है कि वह बैग में कुरआन रखकर लाया है। बैग खोलने पर उसमे से तिरंगा निकलता है।

क्या रॉ के अधिकारी इस स्तर पर जाकर लड़ते होंगे। हम समझ गए कि आपने ये दृश्य दिखाकर मुस्लिमों की देशभक्ति पर संदेह करने वालों को प्रतिउत्तर दिया है। यहाँ आप दिखाते हैं कि भारत को उन पंद्रह पाकिस्तानी नर्सों से कोई सहानुभूति नहीं है। फिर मुझे याद आता है कि भारत ने कितने पाकिस्तानियों की 'आउट ऑफ़ बॉक्स' जाकर मदद की है और अपने लोगों की आलोचना भी सुनी है। तो ईराक में भारत की रॉ और पाकिस्तान की आईएसआई मिलकर काम करती है। नर्सों को छुड़ा लिया जाता है। विजयश्री के बाद भारत और पाकिस्तान के झंडे लहराए जाते हैं।

कन्विंसिंग सीन
भारत-पाकिस्तान साथ मिलकर काम करे इसके लिए निर्देशक को एक तार्किक दृश्य तैयार करना पड़ा ताकि दर्शक असहज महसूस न करे। इस सीन में परेश रावल का किरदार कहता है ' यानि जज़्बाती दोनों तरफ हैं, इस पार भी, उस पार भी'। ऐसे बहुत से तर्क दिए गए हैं जिससे आपको परदे पर ये घालमेल स्वीकार्य हो। बताया गया है कि रॉ टाइगर पर इसलिये शक़ करती है कि उसने पाकिस्तानी ज़ोया से शादी की है। ये कैसा तर्क है। हमने कभी सानिया मिर्ज़ा पर आज तक शक़ नहीं किया।

अपनी पिछली फिल्म ट्यूबलाइट में सलमान खान ने हिंदी-चीनी का मुद्दा उठाया था और मुंह की खाई थी। अब वे भारत-पाकिस्तान की दोस्ती की बात करते हैं बल्कि और आगे बढ़कर पाकिस्तान का झंडा भी लहरा देते हैं। भाई और उनकी टीम को सीखना होगा कि पश्चिम में ऐसे विषयों पर बहुत शोध के बाद फिल्म बनाई जाती है। स्क्रीनप्ले में इतने झोल हैं कि साफ़ नज़र आता है कि आप 'नकली देशभक्ति' की लहर पैदा करने के लिए दृश्यों को गढ़ रहे हैं। इन दृश्यों की कोई स्ट्रांग सिचुएशन नहीं बनाई गई इसलिए टाट के पैबंद की तरह लगते हैं।

सेंसर बोर्ड अध्यक्ष श्रीमान प्रसून जोशी जी ने निश्चित ही ये फिल्म देखी होगी। क्या उन्हें फिल्म में कुछ आपत्तिजनक नहीं लगा। या फिर मेरे जैसे समीक्षकों की दृष्टि और समझ खराब हो गई है। या फिर पाकिस्तान से हमारे संबंध इतने मधुर हो गए हैं कि अपनी फिल्मों में ख़ुशी-ख़ुशी उनका झंडा भी फहरा दे। क्या प्रसून को फिल्म में अन्तर्निहित संदेश दिखाई नहीं दिया। क्या उन्होंने नहीं देखा कि कुछ ख़ास दृश्यों में भारत को 'खलनायक' की तरह पेश किया गया। ऊपर से चार-छह जुनूनी देशभक्ति के दृश्य ठोंक दो और फिल्म पास करवा लो।

फिल्म की शास्त्रीय समीक्षा क्या करू। आप नर्सों के बंधक बनने का तनाव भरा सीक्वेंस डालते हैं और अगले ही सीन में टाइगर और जोया का रोमांटिक गीत ठोंक डालते हैं। रॉ के अधिकारी धर्म को लेकर बहस करते हैं। बंधन से छूटने और साथियों तक पहुँचने के पांच मिनट में टाइगर की दाढ़ी तीन बार ट्रिम हो जाती है।  नर्स के शरीर से बंधे बम का टाइमर पचास से पचपन, फिर अस्सी, फिर साठ की डिजिट दिखाता है, जैसे बम के टाइमर की याददाश्त गजनी जैसी हो जो बार-बार भूल जाता है कि उसे शून्य पर जाना है। 

शाबाश कटरीना
एक फाइट सीक्वेंस है। ज़ोया (कटरीना कैफ) आतंकियों से लड़ रही हैं। पार्श्व में इरशाद कामिल का एक गीत चलता है जो औरत की बेइंतेहा ताकत बयां कर रहा है। एक जासूस के किरदार में उन्होंने अभिनय से लेकर स्टंट में सलमान को एक तरफ़ा पछाड़ा है।  एक्शन दृश्यों में वे बेहद विश्वसनीय दिखी हैं। इस सीक्वेंस को यदि किसी हॉलीवुड के निर्देशक ने देख लिया तो उन्हें निश्चित ऑफर आएगा।  गजब का सीक्वेंस, बेहतरीन अदाकारी।  वे आँखों और हाथों से क्या खूब बोली हैं।

ये निर्णय आपका है कि ये फिल्म देखे या नहीं। एक प्रोफेशनल फ़िल्मकार ने बनाई है। कसी हुई फिल्म है। आदित्य चोपड़ा ने इस प्रोजेक्ट पर खासी मेहनत की है। लोगों को पसंद भी आ रही है लेकिन टिकट मिलना मुश्किल हो जाए ऐसा माहौल भी नहीं बना है। पहले शो से बाहर आते हुए एक दर्शक ने एक वाक्य में फिल्म की समीक्षा कर दी। उन्होंने कहा ' फिल्म में  सबकुछ ठीक है यार लेकिन ये पाकिस्तान का एंगल लाकर  फिल्म की'भद पीट दी, सच ही कहा उसने। भारतीय दर्शक कभी 'पाकिस्तान' के नाम पर कन्विंस नहीं हो सकता।

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